छत्रपति शिवाजी महाराज : संघर्ष, स्वराज और स्वाभिमान का दार्शनिक घोष
राजेश अस्थाना अनंत
जब हौसले बुलंद हों, तो पहाड़ भी मिट्टी का ढेर लगते हैं—यह पंक्ति केवल प्रेरक कथन नहीं, बल्कि छत्रपति शिवाजी महाराज के सम्पूर्ण जीवन-दर्शन का सार है। उनका जीवन एक योद्धा की कथा भर नहीं, बल्कि संघर्ष, विवेक, नीति और आत्मसम्मान पर आधारित एक गहन दार्शनिक यात्रा है।
1. संघर्ष से संस्कार तक
शिवाजी महाराज का जन्म एक ऐसे समय में हुआ जब भारत राजनीतिक अस्थिरता, विदेशी आक्रमणों और आंतरिक विघटन से जूझ रहा था। उन्होंने बाल्यावस्था से ही यह समझ लिया था कि स्वतंत्रता केवल तलवार से नहीं, बल्कि चेतना, संगठन और नैतिक बल से प्राप्त होती है। उनकी माता जिजाऊ द्वारा दिए गए संस्कारों ने उन्हें यह सिखाया कि शक्ति का उद्देश्य शोषण नहीं, संरक्षण है।
2. हिन्द स्वराज : सत्ता नहीं, स्वाभिमान
शिवाजी महाराज द्वारा प्रतिपादित हिन्द स्वराज का विचार केवल एक राज्य-व्यवस्था नहीं था, बल्कि आत्मनिर्भरता और सांस्कृतिक स्वाभिमान का घोष था। उनके लिए स्वराज का अर्थ था—ऐसा शासन जहाँ न्याय, धर्म और लोककल्याण सर्वोपरि हों। यह दर्शन आज के लोकतांत्रिक मूल्यों से भी कहीं गहरा और मानवीय दिखाई देता है।
3. युद्धनीति और नैतिकता का संतुलन
शिवाजी महाराज को सर्वश्रेष्ठ रणनीतिकार इसलिए नहीं कहा जाता कि उन्होंने युद्ध जीते, बल्कि इसलिए कि उन्होंने युद्ध को अंतिम विकल्प माना। उनकी गुरिल्ला युद्धनीति परिस्थितियों के अनुकूल बुद्धि के प्रयोग का उदाहरण है। साथ ही, स्त्रियों, साधुओं और सामान्य नागरिकों के प्रति उनका सम्मान यह सिद्ध करता है कि नीति विहीन विजय, पराजय से भी निकृष्ट होती है।
4. धर्मरक्षा का व्यापक अर्थ
शिवाजी महाराज का धर्म केवल पूजा-पद्धति तक सीमित नहीं था। उनके लिए धर्म का अर्थ था—न्याय, करुणा, सत्य और कर्तव्य। वे किसी भी धर्म के विरुद्ध नहीं थे, बल्कि अधर्म और अत्याचार के विरुद्ध थे। यही कारण है कि उनके प्रशासन में विभिन्न समुदायों को सम्मान और सुरक्षा प्राप्त थी।
5. नेतृत्व का दार्शनिक आदर्श
शिवाजी महाराज का नेतृत्व भय पर नहीं, विश्वास पर आधारित था। वे स्वयं कष्ट सहते थे, पर प्रजा पर बोझ नहीं डालते थे। यह नेतृत्व का वह आदर्श है जहाँ राजा सेवक होता है और सत्ता साधन, साध्य नहीं।
6. आज के संदर्भ में शिवाजी दर्शन
आज जब राष्ट्र, समाज और व्यक्ति अनेक स्तरों पर संकट से गुजर रहे हैं, शिवाजी महाराज का जीवन हमें यह सिखाता है कि
स्वतंत्रता का आधार आत्मसम्मान है,
शक्ति का मूल्य नैतिकता से तय होता है,
और संस्कृति जीवित रहती है संघर्ष से, समझौते से नहीं।
निष्कर्ष
छत्रपति शिवाजी महाराज इतिहास के पन्नों में बंद कोई चरित्र नहीं, बल्कि साहस, विवेक और राष्ट्रधर्म की जीवित चेतना हैं। उनका जीवन हमें बताता है कि यदि उद्देश्य पवित्र हो और संकल्प अडिग, तो सीमित संसाधन भी असाधारण परिणाम दे सकते हैं।
जय भवानी।
जय शिवाजी।
राजेश अस्थाना अनंत
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