14 फ़रवरी : प्रेम का दिन, स्मृति का दिन, प्रश्नों का दिन
राजेश अस्थाना अनंत
14 फ़रवरी को दुनिया प्रेम का उत्सव मनाती है—गुलाब, शब्द, वादे और स्पर्श। लेकिन इसी तारीख़ ने भारत को एक ऐसा घाव भी दिया है, जो समय के साथ भरता नहीं, बल्कि चेतना को और गहरा करता जाता है। यह दिन हमें याद दिलाता है कि प्रेम केवल देना और पाना नहीं है; कभी-कभी प्रेम का सबसे कठोर रूप त्याग होता है—वह त्याग जिसमें कोई अपने प्राण देकर भी शिकायत नहीं करता।
दार्शनिक दृष्टि से देखें तो प्रेम और बलिदान विरोधी नहीं, बल्कि एक ही सत्य के दो आयाम हैं। व्यक्तिगत प्रेम “मैं” से शुरू होता है; राष्ट्रप्रेम “हम” पर समाप्त होता है। गुलाब क्षणिक हैं—खिलते हैं, मुरझाते हैं; पर जिनकी शहादत से हमारी नींद सुरक्षित है, उनका स्मरण स्थायी है। उन्हें भूल जाना केवल स्मृति की चूक नहीं, नैतिक पतन है—क्योंकि स्मृति ही वह सेतु है जो हमें कृतज्ञ बनाती है।
“ब्लैक डे” केवल शोक का नाम नहीं, आत्मपरीक्षण का आह्वान है। यह पूछता है—क्या हमारा प्रेम जिम्मेदार है? क्या हमारी आज़ादी सजग है? क्या हमारा उत्सव उन सीमाओं को याद करता है जहाँ कोई आज भी चौकन्ना खड़ा है? दर्शन कहता है कि स्वतंत्रता बिना स्मृति के स्वेच्छाचार बन जाती है, और प्रेम बिना उत्तरदायित्व के आत्ममुग्धता।
शहीदों को नमन करना केवल मोमबत्ती जलाना नहीं; यह संकल्प लेना है कि हम सत्य, संवेदना और नागरिक कर्तव्य को रोज़ जिएँगे। हम घृणा नहीं बोएँगे, पर भूल भी नहीं करेंगे। हम प्रेम करेंगे, पर स्मरण के साथ—क्योंकि सच्चा प्रेम वही है जो बलिदान की कीमत समझता है।
इसलिए 14 फ़रवरी प्रेम का दिन भी है और क्षति का दिन भी। गुलाब हाथों में हों तो सिर झुका रहे; हृदय में प्रेम हो तो स्मृति जागती रहे। यही संतुलन हमें मनुष्य भी रखता है और राष्ट्र भी।
वीरों को नमन। 🙏🖤🇮🇳
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