स्वामी रामकृष्ण परमहंस : भक्ति, साधना और समन्वय का दार्शनिक प्रकाश
राजेश अस्थाना अनंत
भारतीय आध्यात्मिक परंपरा में स्वामी रामकृष्ण परमहंस का व्यक्तित्व किसी एक संप्रदाय, दर्शन या पूजा-पद्धति में सीमित नहीं है। वे स्वयं एक जीवंत प्रयोगशाला थे, जहाँ भक्ति, ज्ञान, कर्म और योग—सभी धाराएँ एक साथ प्रवाहित होती हैं। माँ काली के अनन्य उपासक होकर भी वे निराकार ब्रह्म के साक्षात्कारकर्ता थे; इसीलिए उनका जीवन अनुभवजन्य दर्शन (Experiential Philosophy) का सर्वोच्च उदाहरण बनता है।
भक्ति से अद्वैत तक : अनुभव का दर्शन
रामकृष्ण परमहंस के लिए ईश्वर कोई बौद्धिक अवधारणा नहीं, बल्कि प्रत्यक्ष अनुभूति थे। उनकी भक्ति भावुकता नहीं, बल्कि आत्म-विसर्जन थी—जहाँ अहं का पूर्ण क्षय होकर साधक और साध्य का भेद मिट जाता है। उन्होंने वैष्णव भक्ति, शाक्त साधना, अद्वैत वेदान्त, इस्लाम और ईसाई साधना—सबको स्वयं जीकर सिद्ध किया कि सत्य एक है, मार्ग अनेक।
यहाँ दर्शन ग्रंथों से नहीं, साधना के तप से जन्म लेता है। रामकृष्ण का अद्वैत शुष्क तर्क नहीं, बल्कि करुणा से भीगा हुआ अद्वैत है—जहाँ हर जीव में ईश्वर की उपस्थिति देखी जाती है।
मानवता और समरसता की दृष्टि
उनकी साधना का अंतिम निष्कर्ष सामाजिक समरसता में प्रकट होता है। वे जाति, धर्म, भाषा और लिंग के भेदों को आध्यात्मिक अज्ञान का परिणाम मानते थे। उनके लिए मानव-सेवा ही ईश्वर-सेवा थी—पर उपदेश के रूप में नहीं, स्वाभाविक करुणा के रूप में।
यही कारण है कि उनका दर्शन किसी मठ की चारदीवारी में बंद नहीं रहा; वह आगे चलकर समाज-सेवा, शिक्षा और राष्ट्र-निर्माण के रूप में फला-फूला।
गुरु–शिष्य का अद्वितीय संबंध : रामकृष्ण और विवेकानंद
स्वामी विवेकानंद का निर्माण
रामकृष्ण परमहंस और स्वामी विवेकानंद का संबंध केवल गुरु–शिष्य का नहीं, बल्कि चेतना के हस्तांतरण का संबंध है। जहाँ रामकृष्ण स्वयं समाधि में लीन रहने वाले संत थे, वहीं विवेकानंद कर्मभूमि में उतरने वाले सिंह थे।
युवा नरेन्द्र (विवेकानंद) तर्कशील थे, प्रश्नाकुल थे, ईश्वर को प्रमाण के तराजू पर तौलना चाहते थे। रामकृष्ण ने उन्हें दर्शन नहीं समझाया—उन्होंने ईश्वर को दिखाया। यही वह क्षण था जहाँ तर्क अनुभव के आगे नतमस्तक हुआ।
पूरक व्यक्तित्व
रामकृष्ण — अंतर्मुखी, भावसमाधि में स्थित, साधना के शिखर पर
विवेकानंद — बहिर्मुखी, ओजस्वी, कर्म और संगठन के प्रतीक
रामकृष्ण ने विवेकानंद को वह आध्यात्मिक आधार दिया, जिससे वे संसार का सामना कर सकें; और विवेकानंद ने गुरु की अनुभूति को वैश्विक भाषा दी—शिकागो से लेकर भारत के गाँवों तक।
दर्शन का सामाजिक विस्तार
रामकृष्ण का वाक्य— “जीव में शिव की सेवा”—विवेकानंद के हाथों रामकृष्ण मिशन की सेवा-दृष्टि बना। यहाँ साधना पलायन नहीं, बल्कि समाज में उतरकर पीड़ा हरने का संकल्प बनी।
दार्शनिक निष्कर्ष
स्वामी रामकृष्ण परमहंस भारतीय दर्शन की उस धारा के प्रतिनिधि हैं जहाँ अनुभव सर्वोपरि है। उन्होंने सिद्ध किया कि आध्यात्मिकता विभाजन नहीं, समन्वय सिखाती है; और विवेकानंद के माध्यम से यह दर्शन विश्व-मानवता का मार्गदर्शक बना।
रामकृष्ण बीज थे, विवेकानंद वटवृक्ष।
गुरु मौन थे, शिष्य वाणी।
पर दोनों की चेतना एक ही थी—
मानव में नारायण की खोज।
राजेश अस्थाना अनंत
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