राजनीति से परे थाली की सुरक्षा: खाद्य-मिलावट के खिलाफ साझा जिम्मेदारी

यह विषय किसी दल, नेता या विचारधारा से बड़ा है—यह सीधे नागरिकों के स्वास्थ्य, भरोसे और जीवन से जुड़ा है। जब कोई सांसद या जनप्रतिनिधि सार्वजनिक हित का मुद्दा उठाता है, तो उसे दलगत चश्मे से नहीं, लोकहित की कसौटी पर परखा जाना चाहिए। राज्यसभा सांसद राघव चड्ढा द्वारा खाद्य-मिलावट पर उठाई गई चिंता इसी श्रेणी में आती है।

आज स्थिति यह है कि बाज़ार में “शुद्धता”, “हाइजीन” और “क्वालिटी” के लेबल लगे उत्पादों के पीछे एक डरावनी सच्चाई छिपी है।
दूध में यूरिया, सब्ज़ियों में ऑक्सीटोसिन, पनीर में कॉस्टिक सोडा, मसालों में ईंट का पाउडर, पोल्ट्री में स्टेरॉयड और आइसक्रीम में डिटर्जेंट जैसी बातें अब अफ़वाह नहीं रहीं—ये जांचों में बार-बार उजागर हो चुकी हकीकतें हैं। विडंबना यह है कि जिन खाद्य वस्तुओं को कुछ देशों में पालतू जानवरों के लिए भी अनुपयुक्त माना जाता है, वही वस्तुएँ यहाँ “स्टैंडर्ड” के नाम पर बेची जा रही हैं।

यह समस्या केवल महानगरों तक सीमित नहीं है। आजमगढ़ जैसे जिलों में भी समय-समय पर खाद्य सुरक्षा विभाग द्वारा छापों में मिलावटी दूध, नकली पनीर, रंग-रसायन मिले मसाले और प्रतिबंधित केमिकल्स पकड़े जाने की खबरें सामने आती रही हैं। ये कार्रवाइयाँ यह बताने के लिए पर्याप्त हैं कि समस्या जमीनी और व्यापक है—और उपभोक्ता कहीं भी सुरक्षित नहीं।

इस मुद्दे पर संतुलन ज़रूरी है।

  • एक ओर निगरानी तंत्र की कमजोरी, सीमित संसाधन और ढीला प्रवर्तन है।
  • दूसरी ओर लालच, कम लागत में अधिक मुनाफ़ा और उपभोक्ताओं की जानकारी का अभाव।
  • साथ ही, ईमानदार उत्पादकों और व्यापारियों को भी उसी तराज़ू में तौला जाता है, जो अन्याय है।

समाधान भी राजनीति से ऊपर उठकर ही निकलेगा:

  1. कड़े और त्वरित दंड—लाइसेंस रद्दीकरण से लेकर आपराधिक मुक़दमे तक।
  2. नियमित, पारदर्शी और स्वतंत्र जांच—रैंडम सैंपलिंग, सार्वजनिक रिपोर्टिंग।
  3. उपभोक्ता जागरूकता—क्या देखें, कैसे पहचानें, कहाँ शिकायत करें।
  4. ईमानदार कारोबारियों का संरक्षण—ताकि वे प्रतिस्पर्धा में न पिसें।
  5. तकनीक का उपयोग—ट्रेसबिलिटी, QR-आधारित जांच, मोबाइल लैब्स।

खाद्य-मिलावट पर चुप्पी, असहमति या राजनीतिक शोर—तीनों ही खतरनाक हैं। ज़रूरत है साझा संकल्प की। अगर आज हम राजनीति से ऊपर उठकर समर्थन नहीं करेंगे, तो कल इसकी कीमत अस्पतालों की कतारों और घटती उम्र से चुकानी पड़ेगी।
यह मुद्दा विपक्ष-सत्ता का नहीं, थाली में ज़हर बनाम जीवन का है।

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