महर्षि स्वामी दयानंद सरस्वती : वैदिक चेतना का पुनर्जागरण
राजेश अस्थाना अनंत 
महर्षि स्वामी दयानंद सरस्वती भारतीय चिंतन-परंपरा के उन विरल महापुरुषों में हैं, जिनके लिए दर्शन केवल विचार नहीं, बल्कि जीवन-पद्धति था। वे वैदिक चेतना के महान उद्घोषक थे, जिन्होंने जड़ परंपराओं, अंधविश्वासों और सामाजिक जड़ता के विरुद्ध सत्य, तर्क और आत्मबोध का निर्भीक शंखनाद किया। उनका दर्शन मनुष्य को बाह्य आडंबर से मुक्त कर अंतःकरण की शुद्धि और विवेक की ओर उन्मुख करता है।
स्वामी दयानंद का मूल आग्रह “वेदों की ओर लौटो” मात्र अतीत-गौरव का स्मरण नहीं था, बल्कि वह मानव-चेतना को उसके मौलिक स्रोत से जोड़ने का प्रयास था। उनके अनुसार वेद ज्ञान के शाश्वत सूत्र हैं, जो व्यक्ति को आत्मानुशासन, नैतिकता और सार्वभौमिक मानव-मूल्यों की शिक्षा देते हैं। यह दर्शन मनुष्य को कर्मप्रधान, सत्यनिष्ठ और स्वतंत्र चिंतनशील बनाता है।
उनका जीवन सामाजिक क्रांति का जीवंत दर्शन था। नारी शिक्षा, विधवा पुनर्विवाह, जाति-आधारित भेदभाव का विरोध और समानता का आग्रह—ये सभी उनके आध्यात्मिक दृष्टिकोण की व्यावहारिक अभिव्यक्तियाँ थीं। उन्होंने यह प्रतिपादित किया कि सच्चा धर्म वही है जो मानव को मानव से जोड़ता है, न कि विभाजित करता है।
स्वामी दयानंद का राष्ट्रबोध आध्यात्मिक आधार पर खड़ा था। उनके लिए राष्ट्र केवल भू-खंड नहीं, बल्कि सांस्कृतिक चेतना और नैतिक उत्तरदायित्व का समुच्चय था। आत्मोत्थान के बिना राष्ट्रोत्थान की कल्पना वे अधूरी मानते थे। इसी दृष्टि से उनका चिंतन आज भी प्रासंगिक और मार्गदर्शक है।
उनका तेजस्वी व्यक्तित्व हमें यह स्मरण कराता है कि दर्शन का उद्देश्य पलायन नहीं, बल्कि जागरण है—आत्मा का भी और समाज का भी। महर्षि स्वामी दयानंद सरस्वती की जयंती पर उन्हें नमन करते हुए यही संकल्प सार्थक होगा कि हम सत्य, विवेक और मानव-कल्याण को अपने जीवन का आधार बनाएं।
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