प्राइवेट हॉस्पिटल और “इंश्योरेंस-आधारित लूट”
राजेश अस्थाना अनंत
बीमार शरीर, बीमार व्यवस्था
भारत में बीमारी अब केवल शारीरिक संकट नहीं रही, वह एक आर्थिक आपदा बन चुकी है। और इस आपदा का सबसे बड़ा लाभार्थी बन चुका है — प्राइवेट हॉस्पिटल तंत्र। राज्यसभा में उठी यह बात कि “हॉस्पिटल को जैसे ही पता चलता है कि मरीज के पास इंश्योरेंस है, लूट का मीटर चालू हो जाता है”— कोई भावनात्मक आरोप नहीं, बल्कि लाखों परिवारों का जीता-जागता अनुभव है।
आज इलाज से पहले डॉक्टर नहीं, काउंटर पर बैठा बीमा-अधिकारी सवाल पूछता है —
“इंश्योरेंस है या नहीं?”
यही सवाल तय करता है कि मरीज को इलाज मिलेगा या पैकेज,
दवा मिलेगी या डील,
देखभाल होगी या बिलिंग।
इलाज नहीं, पैकेज बिकता है
जैसे ही मरीज ‘इंश्योर्ड’ घोषित होता है, इलाज एक मेडिकल प्रक्रिया नहीं रह जाता, वह एक कमर्शियल प्रोजेक्ट बन जाता है।
अनावश्यक टेस्ट
महंगी दवाएं
ICU में जरूरत से ज़्यादा दिन
मामूली बीमारी में भी “ऑब्ज़र्वेशन” के नाम पर भर्ती
डिस्चार्ज में जानबूझकर देरी
यह सब इसलिए नहीं कि मरीज की हालत नाज़ुक है, बल्कि इसलिए कि इंश्योरेंस की सीमा अभी बाकी है।
यदि मरीज 5 दिन में ठीक हो सकता है, तो उसे 10–15 दिन अस्पताल में रखा जाता है —
क्योंकि बीमारी नहीं, पॉलिसी की वैधता इलाज तय कर रही होती है।
डॉक्टर से पहले अकाउंटेंट
प्राइवेट हॉस्पिटल में आज डॉक्टर से ज़्यादा अहम भूमिका निभाता है —
अकाउंट्स डिपार्टमेंट।
इलाज का निर्णय मेडिकल साइंस नहीं, बल्कि यह तय करता है कि:
कौन सा टेस्ट इंश्योरेंस में क्लेम हो सकता है
कौन सी दवा बिल में जोड़ी जा सकती है
कौन सा प्रोसीजर “रिकमेंडेड” दिखाया जा सकता है
यहाँ मरीज रोगी नहीं, फाइल नंबर बन जाता है।
आम आदमी: दो तरफ़ से ठगा हुआ
जिसके पास इंश्योरेंस नहीं — वह इलाज से पहले ही हार जाता है।
जिसके पास इंश्योरेंस है — वह इलाज के नाम पर लूटा जाता है।
और अंत में?
क्लेम लिमिट खत्म
अगली बीमारी के लिए पॉलिसी महंगी
प्रीमियम बढ़ा हुआ
मानसिक और आर्थिक थकान अलग
यह कैसी विडंबना है कि बीमा सुरक्षा नहीं, शोषण का लाइसेंस बन चुका है।
सरकारी चुप्पी और नियमन की कमी
सबसे बड़ा सवाल यह नहीं कि प्राइवेट हॉस्पिटल ऐसा क्यों कर रहे हैं,
सबसे बड़ा सवाल है — उन्हें रोक कौन रहा है?
इलाज के रेट तय नहीं
टेस्ट की अनिवार्यता पर निगरानी नहीं
इंश्योरेंस क्लेम और मेडिकल आवश्यकता के बीच कोई स्वतंत्र ऑडिट नहीं
स्वास्थ्य व्यवस्था को बाजार के हवाले कर दिया गया है,
जहाँ मरीज ग्राहक है और बीमारी अवसर।
इलाज व्यापार नहीं, अधिकार है
स्वास्थ्य सेवा कोई लग्ज़री नहीं, मौलिक अधिकार है।
लेकिन जब हॉस्पिटल पाँच सितारा होटल से महंगे हो जाएं,
और बीमारी रूम कैटेगरी से तय हो —
तो समझ लीजिए व्यवस्था बीमार हो चुकी है।
अब क्या ज़रूरी है?
इलाज के मानक प्रोटोकॉल अनिवार्य हों
इंश्योरेंस आधारित इलाज पर स्वतंत्र मेडिकल ऑडिट
ICU, टेस्ट और भर्ती की अवधि पर कानूनी सीमाएं
मरीज को हर प्रक्रिया की लिखित वजह
सरकारी अस्पतालों को मजबूत करना — ताकि विकल्प रहे
निष्कर्ष
आज सवाल यह नहीं कि प्राइवेट हॉस्पिटल गलत कर रहे हैं या नहीं,
सवाल यह है कि हम कब तक इसे सामान्य मानते रहेंगे?
बीमारी शरीर की होती है,
पर लूट व्यवस्था की।
और जब तक इलाज मुनाफ़े का साधन रहेगा,
तब तक अस्पताल कम — कारोबारी केंद्र ज़्यादा रहेंगे।
सरकार को सोचना ही नहीं, कदम उठाना होगा।
क्योंकि अगला मरीज — कोई और नहीं, हम ही हो सकते हैं।
राजेश अस्थाना अनंत
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