“जेलेसी वाला नेचर: भगवान की देन या खुद की मेहनत?”





“जेलेसी वाला नेचर: भगवान की देन या खुद की मेहनत?”
राजेश अस्थाना अनंत

कुछ लोग ऐसे होते हैं जिनकी डिग्री जन्म प्रमाण-पत्र के साथ ही छपी होती है—
नाम के आगे नहीं,
सीधे स्वभाव के पीछे लिखा होता है:
“स्पेशलाइज़ेशन: जेलेसी”।

बचपन में अगर किसी बच्चे के हाथ में दो टॉफियाँ हों,
तो ये तीसरे को ढूँढने लगते हैं—
“इसको ज़्यादा क्यों मिली?”
स्कूल में क्लास टॉपर नहीं बने,
तो खुद की मेहनत पर नहीं,
टॉपर की किस्मत पर शक करते हैं।
“ज़रूर टीचर का दूर का रिश्तेदार होगा!”

इनकी जेलेसी बहुआयामी होती है—
पड़ोसी ने नया फ्रिज लिया तो
इनका बीपी बढ़ जाता है।
दोस्त ने वजन कम किया तो
डाइट नहीं,
नज़र लगा देते हैं।
और अगर कोई खुश दिख जाए,
तो ये गंभीर होकर कहते हैं—
“कुछ ना कुछ गड़बड़ ज़रूर है।”

सोशल मीडिया तो इनके लिए
प्रैक्टिकल लैब है।
दूसरे की सफलता देख कर
लाइक नहीं करते,
सीधे आत्मा से सवाल करते हैं—
“इसमें ऐसा क्या खास है?”
पोस्ट पर कमेंट भले न करें,
लेकिन मन में पीएचडी लेवल विश्लेषण
पूरा हो चुका होता है।

सबसे मज़ेदार बात ये कि
ये लोग खुद को
सबसे भोला और सच्चा इंसान समझते हैं।
इनके अनुसार दुनिया के सारे लोग
या तो नकली हैं
या उनसे आगे निकल गए हैं—
और दोनों ही बातें
अक्षम्य अपराध हैं।

कभी-कभी लगता है
ये लोग जेलेसी लेकर पैदा नहीं हुए,
बल्कि कहीं कोई
“ईर्ष्या इंस्टिट्यूट” है,
जहाँ सिखाया जाता है—
“दूसरों की खुशी कैसे सहन न करें”
और पास होने पर
जन्म के साथ ही नियुक्ति मिल जाती है।

ख़ैर, ऐसे लोगों से लड़ने का
एक ही इलाज है—
खुश रहो, आगे बढ़ो,
और मुस्कुरा कर देखो।
क्योंकि आपकी मुस्कान
इनके लिए वही है
जो मिर्च बिना नमक के—
सीधे असर करती है! 😄

राजेश अस्थाना अनंत


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