चेहरा क्या देखते हो, दिल में उतर के देखो ना।

जीवन को आँकने की भूल और समझ की आवश्यकता
राजेश अस्थाना अनंत

मनुष्य का स्वभाव है—तुलना करना। हम दूसरों को अपने बनाए हुए तराज़ू पर तौलते हैं; किसी को सफल घोषित कर देते हैं, किसी को असफल। पर यह तराज़ू अक्सर हमारा अपना होता है—हमारी सुविधाओं, हमारे संघर्षों, हमारे सपनों और हमारी अपेक्षाओं से गढ़ा हुआ। यही सबसे बड़ी भूल है।

किसी दूसरे व्यक्ति को हम अपने सफलता या असफलता के पैमाने पर नहीं कस सकते, जब तक हम उसके जीवन की दुश्वारियों और उसके जीवन-लक्ष्य को नहीं समझते। क्योंकि हर जीवन की पृष्ठभूमि अलग होती है। कोई समतल रास्ते पर चल रहा होता है, तो कोई पथरीले, काँटों से भरे मार्ग पर। बाहर से जो धीमी चाल दिखती है, वह भीतर चल रही लड़ाई का परिणाम हो सकती है।

समाज प्रायः चेहरे देखकर निर्णय करता है—वेश, पद, धन, प्रतिष्ठा। पर चेहरा तो मुखौटा है, परिस्थितियों द्वारा गढ़ा हुआ। असली मनुष्य उसके भीतर रहता है—उसके डर, उसकी आशाएँ, उसकी हार और उसकी अनकही जीतें। इसलिए कहा गया है—
“चेहरा क्या देखते हो, दिल में उतर के देखो ना।”
यह पंक्ति केवल भावुक आग्रह नहीं, बल्कि एक गहरी दार्शनिक सीख है। यह हमें सहानुभूति (empathy) का मार्ग दिखाती है, जहाँ निर्णय नहीं, समझ प्रधान होती है।

सफलता का अर्थ हर व्यक्ति के लिए एक-सा नहीं होता। किसी के लिए ऊँचा पद सफलता है, तो किसी के लिए दो वक्त की रोटी जुटा लेना। किसी के लिए आत्मनिर्भर होना बड़ी उपलब्धि है, तो किसी के लिए परिस्थितियों के बावजूद ईमानदार बने रहना। जब हम किसी को “असफल” कहते हैं, तो दरअसल हम उसके लक्ष्य को अपने लक्ष्य से बदल देते हैं—और यही अन्याय है।

दार्शनिक दृष्टि से देखें तो जीवन एक दौड़ नहीं, बल्कि एक यात्रा है। इस यात्रा में हर यात्री का बोझ अलग है, गति अलग है और मंज़िल भी अलग। जो व्यक्ति अपने बोझ के साथ एक कदम भी आगे बढ़ता है, वह अपने लिए सफल है, चाहे दुनिया उसे कुछ भी कहे।

बिना समझे किया गया मूल्यांकन अहंकार को जन्म देता है और समझ से किया गया दृष्टिकोण करुणा को। करुणा ही वह सेतु है जो मनुष्य को मनुष्य से जोड़ती है। जब हम दूसरों के दिल में उतरने का प्रयास करते हैं, तब हमें अपने निर्णयों की संकीर्णता दिखाई देती है और दृष्टि व्यापक होती है।

अतः आवश्यकता है कि हम दूसरों को आँकने से पहले ठहरें, सुनें और समझें। चेहरों से आगे जाकर जीवन की परतों को पढ़ें। क्योंकि हो सकता है, जिसे हम असफल समझ रहे हों, वह अपने संघर्ष की सबसे कठिन लड़ाई जीत रहा हो—चुपचाप, बिना किसी तालियों के।

यही जीवन का सत्य है—
समझ के बिना कोई भी निर्णय अधूरा है, और करुणा के बिना कोई भी मूल्यांकन अन्यायपूर्ण।
राजेश अस्थाना अनंत


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