भारतेन्दु हरिश्चंद्र : आधुनिक हिन्दी साहित्य के पितामह

भारतेन्दु हरिश्चंद्र : आधुनिक हिन्दी साहित्य के पितामह
(पुण्यतिथि पर विनम्र श्रद्धांजलि)
राजेश अस्थाना अनंत 

आधुनिक हिन्दी साहित्य के इतिहास में भारतेन्दु हरिश्चंद्र (1850–1885) का नाम युग-प्रवर्तक रचनाकार के रूप में स्वर्णाक्षरों में अंकित है। वे केवल कवि या नाटककार ही नहीं थे, बल्कि पत्रकार, समाज-सुधारक, निबंधकार और सांस्कृतिक चेतना के सजग प्रहरी भी थे। उनकी अल्पायु—केवल 35 वर्ष—के बावजूद उनका साहित्यिक अवदान इतना व्यापक और गहन है कि हिन्दी नवजागरण का संपूर्ण परिदृश्य उनके बिना अधूरा प्रतीत होता है।

हिन्दी नवजागरण के अग्रदूत
भारतेन्दु हरिश्चंद्र का रचनाकाल उस समय का प्रतिनिधित्व करता है जब भारत सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक रूप से गहन संक्रमण से गुजर रहा था। औपनिवेशिक शासन, सामाजिक कुरीतियाँ, भाषायी हीनता और राष्ट्रीय अस्मिता का संकट—इन सबके बीच भारतेन्दु ने हिन्दी को जनभाषा के रूप में प्रतिष्ठित करने का संकल्प लिया। उन्होंने साहित्य को केवल सौंदर्य का साधन न मानकर समाज-परिवर्तन का सशक्त माध्यम बनाया।

आस्था और सांस्कृतिक चेतना
भारतेन्दु की रचनाओं में भारतीय आस्था और सांस्कृतिक मूल्यों की सशक्त अभिव्यक्ति मिलती है। वे भारतीय परंपरा, लोकजीवन और धर्म-संस्कृति से गहरे जुड़े हुए थे। किंतु उनकी आस्था अंधविश्वास नहीं, बल्कि विवेकपूर्ण और लोकमंगलकारी थी। वे ऐसी संस्कृति के पक्षधर थे जो समयानुकूल परिवर्तन को स्वीकार करे और मानव-मूल्यों को केंद्र में रखे।

अस्मिता और भाषा का प्रश्न
भारतेन्दु हरिश्चंद्र ने हिन्दी भाषा को आत्मसम्मान और अस्मिता से जोड़ा। उनका प्रसिद्ध कथन—
“निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल”
हिन्दी साहित्य का घोषवाक्य बन गया। वे मानते थे कि किसी भी राष्ट्र की उन्नति उसकी भाषा, साहित्य और सांस्कृतिक चेतना से जुड़ी होती है। उनकी रचनाओं में भाषायी स्वाभिमान के साथ-साथ भारतीय पहचान की स्पष्ट चेतना दिखाई देती है।

राष्ट्रवाद की चेतना
भारतेन्दु का राष्ट्रवाद भावनात्मक होने के साथ-साथ बौद्धिक भी था। उन्होंने औपनिवेशिक शोषण, आर्थिक दुर्दशा और सामाजिक जड़ता पर तीखा प्रहार किया। उनके नाटक ‘अंधेर नगरी’ में सत्ता की अविवेकशीलता और समाज की विसंगतियों का जो व्यंग्यात्मक चित्रण मिलता है, वह आज भी उतना ही प्रासंगिक है। उनका राष्ट्रवाद किसी संकीर्णता का नहीं, बल्कि जागरूक, आत्मनिर्भर और नैतिक समाज के निर्माण का स्वप्न था।

विधाओं में बहुआयामी योगदान
भारतेन्दु हरिश्चंद्र ने कविता, नाटक, निबंध, पत्रकारिता और अनुवाद—सभी क्षेत्रों में उल्लेखनीय कार्य किया। उन्होंने हिन्दी नाटक को आधुनिक स्वरूप प्रदान किया और पत्रकारिता के माध्यम से जनचेतना को नई दिशा दी। उनके द्वारा संपादित पत्र-पत्रिकाएँ हिन्दी समाज में वैचारिक आंदोलन का केंद्र बनीं।

निष्कर्ष
भारतेन्दु हरिश्चंद्र आधुनिक हिन्दी साहित्य के पितामह इसलिए नहीं कहे जाते कि उन्होंने केवल नए रूप गढ़े, बल्कि इसलिए कि उन्होंने साहित्य को भारतेन्दु हरिश्चंद्र : आधुनिक हिन्दी साहित्य के पितामह, राष्ट्र और संस्कृति से जोड़ा। आस्था, अस्मिता और राष्ट्रवाद से समृद्ध उनकी रचनाएँ हिन्दी साहित्य की अमूल्य धरोहर हैं और आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणास्रोत बनी रहेंगी।

उनकी पुण्यतिथि पर यही सच्ची श्रद्धांजलि होगी कि हम उनकी वैचारिक चेतना, भाषायी स्वाभिमान और राष्ट्रोन्मुख दृष्टि को अपने साहित्य और जीवन में आत्मसात करें।
भारतेन्दु हरिश्चंद्र को विनम्र नमन।
राजेश अस्थाना अनंत 

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