वृत्त में चलती दुनिया और विनय का दर्शन
राजेश अस्थाना अनंत
दुनिया यदि सीधी रेखा होती, तो आगे-पीछे का भेद स्थायी होता। कोई सदा आगे रहता और कोई हमेशा पीछे। परंतु संसार की संरचना ही वृत्ताकार है—पृथ्वी की तरह, समय की तरह और जीवन की तरह। इस वृत्त में हम सब चल रहे हैं; कोई स्थायी रूप से आगे नहीं, कोई सदा पीछे नहीं। जो आज आगे दिखाई देता है, वही कल पीछे होगा और जो आज पीछे है, वही किसी और क्षण आगे दिखेगा। यह दृष्टि हमें जीवन के सबसे बड़े भ्रम से मुक्त करती है—श्रेष्ठता और हीनता के भ्रम से।
मनुष्य प्रायः तुलना में जीता है। कोई आगे निकल जाए तो दंभ जन्म लेता है और कोई पीछे रह जाए तो ग्लानि। परंतु वृत्त का दर्शन कहता है कि यह दोनों ही भाव असत्य पर आधारित हैं। आगे होना कोई अंतिम उपलब्धि नहीं और पीछे होना कोई स्थायी दोष नहीं। ये तो केवल क्षणिक स्थितियाँ हैं, जो समय के साथ बदलती रहती हैं। जिस क्षण हम इस सत्य को स्वीकार कर लेते हैं, उसी क्षण हमारा मन हल्का हो जाता है।
दार्शनिक दृष्टि से देखें तो यह विचार भारतीय दर्शन के कर्म-सिद्धांत से जुड़ता है। कर्मफल तत्काल नहीं, बल्कि चक्र में मिलता है। जो आज बोया जाता है, वह कल नहीं तो किसी और मोड़ पर फल देता है। इसी तरह यूनानी दर्शन में भी समय को चक्रीय माना गया है और बौद्ध दर्शन में संसार को निरंतर घूमता हुआ चक्र—संसार -चक्र—कहा गया है। इन सभी परंपराओं का संकेत एक ही है: स्थिरता भ्रम है, परिवर्तन सत्य।
जब हम आगे होने के दंभ से मुक्त होते हैं, तो विनम्रता जन्म लेती है। विनम्रता कमजोरी नहीं, बल्कि यथार्थ का बोध है। और जब हम पीछे होने की ग्लानि छोड़ते हैं, तो आत्मविश्वास जागता है। ग्लानि हमें जड़ बना देती है, जबकि स्वीकार हमें गति देता है। वृत्त में चलने वाला व्यक्ति यह जानता है कि हर मोड़ पर नया दृश्य है, नया अवसर है।
इसलिए जीवन का उद्देश्य किसी से आगे निकलना नहीं, बल्कि अपनी गति को समझना है। न तेज़ दया। हर व्यक्ति अपने अनुभव, कर्म और चेतना के अनुसार चल रहा है। तुलना की जगह करुणा और प्रतिस्पर्धा की जगह आत्म-विकास आए, तो समाज भी संतुलित होगा और व्यक्ति भी।
अंततः यह कामना केवल इतनी नहीं कि कैलेंडर की तारीख़ बदले, बल्कि यह है कि हमारी तक़दीर बदले—और तक़दीर तभी बदलती है जब दृष्टि बदलती है। जिस दिन हम रेखीय सोच छोड़कर वृत्तीय सोच अपना लेते हैं, उसी दिन दंभ भी गल जाता है और ग्लानि भी। तब जीवन एक दौड़ नहीं, एक यात्रा बन जाता है—जहाँ हर कदम अर्थपूर्ण है और हर मोड़ सीख देने वाला।
राजेश अस्थाना अनंत
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