“ईश्वर : विश्वास और अविश्वास के बीच मानव चेतना की दार्शनिक यात्रा”

“ईश्वर : विश्वास और अविश्वास के बीच मानव चेतना की दार्शनिक यात्रा”
राजेश अस्थाना अनंत

ईश्वर के अस्तित्व का प्रश्न मानव चिंतन के सबसे पुराने और गहरे प्रश्नों में से एक है। सामान्यतः इसे दो ही अवस्थाओं में समझा जाता है—या तो व्यक्ति ईश्वर को मानता है, या नहीं मानता। परंतु दर्शन इस द्वैत को केवल विश्वास-अविश्वास तक सीमित नहीं रखता, बल्कि उसे तर्क, अनुभव और जीवन-दृष्टि से जोड़कर देखता है।

भारतीय दर्शन में ईश्वर का प्रश्न बहुआयामी है। वेदांत की अद्वैत परंपरा में शंकराचार्य ब्रह्म को निराकार, निर्विशेष सत्य मानते हैं—यहाँ ईश्वर किसी व्यक्ति विशेष के रूप में नहीं, बल्कि समस्त अस्तित्व की चेतना है। सांख्य दर्शन ईश्वर को स्वीकार नहीं करता, फिर भी प्रकृति और पुरुष के संतुलन से सृष्टि की व्याख्या करता है। योग दर्शन में ईश्वर एक “विशेष पुरुष” है—आदर्श, मार्गदर्शक, पर अनिवार्य सृष्टिकर्ता नहीं। अर्थात भारतीय दर्शन में ईश्वर को मानना या न मानना, दोनों ही मार्ग आत्मबोध की ओर ले जाते हैं।

पाश्चात्य दर्शन में यह प्रश्न अधिक तर्कप्रधान रहा है। प्लेटो और अरस्तू ने ईश्वर को प्रथम कारण या परम शुभ के रूप में देखा। मध्यकाल में एक्विनास ने ईश्वर के अस्तित्व के पक्ष में तर्क दिए, जबकि आधुनिक युग में डेविड ह्यूम और नीत्शे ने इन धारणाओं को चुनौती दी। नीत्शे का “ईश्वर की मृत्यु” का कथन ईश्वर के अंत से अधिक, पारंपरिक नैतिकता के पतन की घोषणा था। यहाँ ईश्वर को मानना या न मानना, व्यक्ति की बौद्धिक स्वतंत्रता का प्रश्न बन जाता है।

चीनी दर्शन इस द्वैत से कुछ अलग खड़ा दिखाई देता है। कन्फ्यूशियस ने ईश्वर से अधिक नैतिक आचरण और सामाजिक संतुलन पर बल दिया। ताओवाद में ‘ताओ’ कोई व्यक्तिगत ईश्वर नहीं, बल्कि प्रकृति का स्वाभाविक नियम है। यहाँ प्रश्न ईश्वर के अस्तित्व का नहीं, बल्कि उसके साथ सामंजस्य का है।

निष्कर्षतः, ईश्वर को मानना या न मानना एक निजी निर्णय हो सकता है, पर दर्शन बताता है कि यह निर्णय अंतिम नहीं, यात्रा का एक चरण है। कहीं ईश्वर चेतना है, कहीं कारण, कहीं नैतिक अनुशासन और कहीं प्रकृति का नियम। इसलिए शायद सत्य यह नहीं कि ईश्वर है या नहीं, बल्कि यह कि मनुष्य उसे किस दृष्टि से देखता है।
राजेश अस्थाना अनंत


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