दरिया बनाम जरिया
जीवन में ताक़त का अर्थ केवल प्रभावी होना नहीं, बल्कि सार्थक होना है। हम में से अधिकतर लोग किसी को डुबो देने वाली लहर बनना आसान समझते हैं — आलोचना, आरोप, उपेक्षा या क्रोध के माध्यम से किसी के आत्मविश्वास को तोड़ देना सबसे सरल मार्ग है। यह वह शक्ति है जो अहंकार से उपजती है, और जिसका उद्देश्य स्वयं को बड़ा सिद्ध करना है, न कि दूसरे को संभालना।
परंतु असली बात तब बनती है जब हम “दरिया” नहीं, “जरिया” बनने का साहस जुटाते हैं — ऐसा जरिया जो किसी को बचा सके, थाम सके, दिशा दे सके। किसी टूटे मन के लिए सहारा बनना, किसी भटके हुए को राह दिखाना, किसी निराश व्यक्ति में विश्वास भर देना — ये सब वही क्षण हैं जब हम सिर्फ़ अस्तित्व नहीं, बल्कि उपयोगी अस्तित्व बनते हैं।
डुबोना और बचाना—दोनों में अंतर केवल इरादे का है।
जो भीतर से असुरक्षित है, वह दूसरों को गिराकर अपने होने का प्रमाण खोजता है। लेकिन जो भीतर से समृद्ध है, वह दूसरों को उठाकर अपनी सार्थकता प्रमाणित करता है।
डुबाना इसलिए आसान है, क्योंकि उसमें संवेदना की आवश्यकता नहीं होती। बचाने के लिए हृदय चाहिए, विनम्रता चाहिए, धैर्य चाहिए, और सबसे बढ़कर — उस व्यक्ति के प्रति विश्वास चाहिए जिसे समाज नाकारा घोषित कर चुका हो।
जब हम दरिया बनकर किसी को बहा देते हैं, तब हम केवल अपनी सामर्थ्य दिखाते हैं।
जब हम जरिया बनकर किसी को किनारे तक पहुँचा देते हैं, तब हम अपनी मानवता दिखाते हैं।
समाज को दरिया नहीं, जरिया चाहिए।
उसे ऐसे लोग चाहिए जो मार्ग बनें, अवरोध नहीं। जिन्हें चोट बाँटना नहीं, मरहम बनना आता हो। जिन्हें दूसरों की असफलताओं पर व्याख्यान देने की जगह, उनके हाथ पकड़कर संभावना की ओर ले जाना आता हो।
और अंत में—
दरिया होना प्रकृति है,
जरिया होना संस्कार है।
इसी संस्कार को जीवित रखना ही मनुष्य होने का सार है।
राजेश अनंत
"दरिया बनाम जरिया", को प्रतिलिपि पर पढ़ें :,
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