नेताजी सुभाष चंद्र बोस : व्यक्तित्व, कृतित्व, संघर्ष और वर्तमान प्रासंगिकता
राजेश अस्थाना अनंत
भारत के स्वतंत्रता संग्राम में जिन व्यक्तित्वों ने अपने अदम्य साहस, वैचारिक दृढ़ता और क्रांतिकारी संकल्प से इतिहास की दिशा बदली, उनमें नेताजी सुभाष चंद्र बोस का नाम स्वर्णाक्षरों में अंकित है। 23 जनवरी को मनाई जाने वाली उनकी जयंती केवल एक महान नेता की स्मृति नहीं, बल्कि राष्ट्र के आत्मसम्मान, त्याग और संपूर्ण स्वतंत्रता के स्वप्न का उत्सव है।
1. नेताजी का व्यक्तित्व : विचार, साहस और अनुशासन का संगम
सुभाष चंद्र बोस का व्यक्तित्व बहुआयामी था। वे तेजस्वी बुद्धि, अपार आत्मविश्वास और कठोर अनुशासन के प्रतीक थे। आई.सी.एस. जैसी प्रतिष्ठित सेवा को त्याग देना उनके चरित्र की असाधारण दृढ़ता को दर्शाता है।
उनका व्यक्तित्व केवल एक राजनेता का नहीं, बल्कि एक विचारक, संगठनकर्ता, सैनिक नेता और राष्ट्रभक्त दार्शनिक का था। वे भावुक राष्ट्रवाद के साथ-साथ व्यावहारिक रणनीति के पक्षधर थे।
उनका प्रसिद्ध उद्घोष— “तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आज़ादी दूँगा”—उनके निर्भीक, बलिदानी और कर्मप्रधान व्यक्तित्व का सार प्रस्तुत करता है।
2. नेताजी के कार्य : संगठन, संघर्ष और क्रांति
नेताजी ने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन को नई ऊर्जा और दिशा प्रदान की। उनके प्रमुख कार्यों में—
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में नेतृत्व : वे कांग्रेस के अध्यक्ष बने और पार्टी में अधिक सक्रिय, आक्रामक और निर्णायक भूमिका के समर्थक रहे।
फॉरवर्ड ब्लॉक की स्थापना : वैचारिक मतभेदों के कारण उन्होंने कांग्रेस से अलग होकर फॉरवर्ड ब्लॉक का गठन किया, ताकि स्वतंत्रता आंदोलन को क्रांतिकारी गति मिल सके।
आजाद हिंद फौज का गठन : उनका सबसे ऐतिहासिक योगदान आज़ाद हिंद फौज (INA) का पुनर्गठन और नेतृत्व था।
अंतरराष्ट्रीय समर्थन : उन्होंने जर्मनी, जापान और दक्षिण-पूर्व एशिया में भारत की आज़ादी के लिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग जुटाया।
आजाद हिंद सरकार : 1943 में सिंगापुर में स्वतंत्र भारत की अस्थायी सरकार की स्थापना, जिसमें उन्होंने राष्ट्रीय ध्वज फहराया और शासन की संरचना खड़ी की।
3. भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में भूमिका
जहाँ महात्मा गांधी अहिंसा के मार्ग से स्वतंत्रता के पक्षधर थे, वहीं नेताजी सुभाष चंद्र बोस सशस्त्र संघर्ष को भी आवश्यक मानते थे।
उन्होंने ब्रिटिश साम्राज्यवाद को उसकी सैन्य शक्ति के स्तर पर चुनौती दी। आज़ाद हिंद फौज का नारा— “दिल्ली चलो”—भारतीय जनमानस में स्वाधीनता की तीव्र आकांक्षा का प्रतीक बन गया।
उनके प्रयासों ने ब्रिटिश सरकार की नींव हिला दी। INA के सैनिकों पर चलाए गए मुकदमों ने देशव्यापी जनआंदोलन को जन्म दिया, जिसने अंततः ब्रिटिश सत्ता के अंत को तेज किया।
4. नेताजी की विचारधारा
नेताजी एक ऐसे भारत की कल्पना करते थे—
जो सामाजिक रूप से न्यायपूर्ण हो
आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर हो
राजनीतिक रूप से सशक्त और स्वतंत्र हो
जहाँ धर्म, जाति और भाषा से ऊपर उठकर राष्ट्रीय एकता स्थापित हो
वे अनुशासित लोकतंत्र और समाजवादी झुकाव के समर्थक थे, जिसमें राष्ट्रहित सर्वोपरि हो।
5. वर्तमान समय में नेताजी की प्रासंगिकता
आज के भारत में सुभाष चंद्र बोस की प्रासंगिकता और भी अधिक बढ़ जाती है—
राष्ट्रीय एकता और अखंडता के लिए उनका विचार आज भी प्रेरक है।
युवा शक्ति के लिए उनका साहस, अनुशासन और कर्तव्यनिष्ठा आदर्श है।
आत्मनिर्भर भारत की अवधारणा उनके स्वप्न से गहराई से जुड़ी है।
सिद्धांत और कर्म की एकता—जो आज के सार्वजनिक जीवन में दुर्लभ होती जा रही है—नेताजी के जीवन का मूल मंत्र था।
गोपाल प्रसाद व्यास द्वारा रचित नेताजी सुभाष चंद्र बोस पर आधारित प्रेरक कविता में यह स्पष्ट रूप से उभरता है कि नेताजी केवल एक सेनानायक नहीं, बल्कि जन-जन में आज़ादी की ज्वाला जगाने वाले महापुरुष थे। कविता में उनके ओजस्वी व्यक्तित्व, निर्भीक नेतृत्व और बलिदान की भावना का सजीव चित्रण है। वह युवाओं को संघर्ष, आत्मसम्मान और राष्ट्रहित के लिए उठ खड़े होने का आह्वान करते हैं।
वह ख़ून कहो किस मतलब का
जिसमें उबाल का नाम नहीं
वह ख़ून कहो किस मतलब का
आ सके देश के काम नहीं
वह ख़ून कहो किस मतलब का
जिसमें जीवन न रवानी है
जो परवश में होकर बहता है
वह ख़ून नहीं है पानी है
उस दिन लोगों ने सही सही
खूँ की कीमत पहचानी थी
जिस दिन सुभाष ने बर्मा में
मांगी उनसे कुर्बानी थी
बोले स्वतंत्रता की खातिर
बलिदान तुमहे करना होगा
बहुत जी चुके हो जग में
लेकिन आगे मरना होगा
आजादी के चरणों में जो
जयमाल चढाई जाएगी
वह सुनो तुम्हारे शीशों के
फूलों से गूंथी जाएगी
आज़ादी का संग्राम कहीं
पैसे पर खेला जाता है?
ये शीश कटाने का सौदा
नंगे सर झेला जाता है
आज़ादी का इतिहास कहीं
काली स्याही लिख पाती है?
इसको पाने को वीरों ने
खून की नदी बहाई जाती है
यह कहते कहते वक्ता की
आंखों में खून उतर आया
मुख रक्त वर्ण हो दमक उठा
चमकी उनकी रक्तिम काया
आजानु बाहु ऊंचा करके
वे बोले रक्त मुझे देना
इसके बदले में भारत की
आज़ादी तुम मुझसे लेना
हो गई सभा में उथल पुथल
सीने में दिल न समाते थे
स्वर इंकलाब के नारों के
कोसों तक झाए जाते थे
हम देंगे देंगे ख़ून
स्वर बस यही सुनाई देते थे
रण में जाने को युवक
खड़े तैयार दिखाई देते थे
बोले सुभाष इस तरह नहीं
बातों से मतलब सरता है
मैं कलम बढ़ता हूँ, आये
जो खूनी हस्ताक्षर करता है
इसको भरने वाले जन को
सर्वस्व समर्पण करना है
अपना तन-मन-धन-जन-जीवन
माता को अर्पण करना है
पर यह साधारण पत्र नहीं
आज़ादी का परवाना है
इसपर तुमको अपने तन का
कुछ उज्ज्वल रक्त गिराना है
वह आगे आए जिसकी रग में
खून भारतीय बहता है
वह आगे आए जो ख़ुद को
हिन्दुस्तानी कहता है
वह आगे आए जो इसपर
खूनी हस्ताक्षर देता है
मैं कफन बढाता हूँ आए
जो इसको हँसकर लेता है
सारी जनता हुंकार उठी
हम आते हैं, हम आते हैं
माता के चरणों में लो
हम अपना रक्त चढाते हैं
साहस से बढे युवक उस दिन
देखा बढते ही आते थे
चाकू छुरी कटारियों से
वे अपना रक्त गिराते थे
फिर उसी रक्त की स्याही में
वे अपना कलम डुबोते थे
आज़ादी के परवाने पर
हस्ताक्षर करते जाते थे
उस दिन तारों ने देखा था
हिन्दुस्तानी विश्वास नया
लिखा था जब रणवीरों ने
खूँ से अपना इतिहास नया
उपसंहार
नेताजी सुभाष चंद्र बोस केवल एक ऐतिहासिक व्यक्तित्व नहीं, बल्कि भारत की आत्मा की आवाज़ थे। उनका जीवन हमें सिखाता है कि स्वतंत्रता केवल अधिकार नहीं, बल्कि त्याग, साहस और निरंतर संघर्ष की परिणति होती है।
उनकी जयंती पर उन्हें स्मरण करना तभी सार्थक होगा, जब हम उनके आदर्शों—राष्ट्रभक्ति, अनुशासन, साहस और सामाजिक न्याय—को अपने जीवन और राष्ट्रनिर्माण में उतार सकें।
नेताजी अमर हैं—अपने विचारों में, अपने संघर्ष में और भारत के भविष्य में।
राजेश अस्थाना अनंत
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