महर्षि स्वामी दयानंद सरस्वती : वैदिक चेतना का पुनर्जागरण

महर्षि स्वामी दयानंद सरस्वती : वैदिक चेतना का पुनर्जागरण

राजेश अस्थाना अनंत 

महर्षि स्वामी दयानंद सरस्वती भारतीय चिंतन-परंपरा के उन विरल महापुरुषों में हैं, जिनके लिए दर्शन केवल विचार नहीं, बल्कि जीवन-पद्धति था। वे वैदिक चेतना के महान उद्घोषक थे, जिन्होंने जड़ परंपराओं, अंधविश्वासों और सामाजिक जड़ता के विरुद्ध सत्य, तर्क और आत्मबोध का निर्भीक शंखनाद किया। उनका दर्शन मनुष्य को बाह्य आडंबर से मुक्त कर अंतःकरण की शुद्धि और विवेक की ओर उन्मुख करता है।

स्वामी दयानंद का मूल आग्रह “वेदों की ओर लौटो” मात्र अतीत-गौरव का स्मरण नहीं था, बल्कि वह मानव-चेतना को उसके मौलिक स्रोत से जोड़ने का प्रयास था। उनके अनुसार वेद ज्ञान के शाश्वत सूत्र हैं, जो व्यक्ति को आत्मानुशासन, नैतिकता और सार्वभौमिक मानव-मूल्यों की शिक्षा देते हैं। यह दर्शन मनुष्य को कर्मप्रधान, सत्यनिष्ठ और स्वतंत्र चिंतनशील बनाता है।

उनका जीवन सामाजिक क्रांति का जीवंत दर्शन था। नारी शिक्षा, विधवा पुनर्विवाह, जाति-आधारित भेदभाव का विरोध और समानता का आग्रह—ये सभी उनके आध्यात्मिक दृष्टिकोण की व्यावहारिक अभिव्यक्तियाँ थीं। उन्होंने यह प्रतिपादित किया कि सच्चा धर्म वही है जो मानव को मानव से जोड़ता है, न कि विभाजित करता है।

स्वामी दयानंद का राष्ट्रबोध आध्यात्मिक आधार पर खड़ा था। उनके लिए राष्ट्र केवल भू-खंड नहीं, बल्कि सांस्कृतिक चेतना और नैतिक उत्तरदायित्व का समुच्चय था। आत्मोत्थान के बिना राष्ट्रोत्थान की कल्पना वे अधूरी मानते थे। इसी दृष्टि से उनका चिंतन आज भी प्रासंगिक और मार्गदर्शक है।

उनका तेजस्वी व्यक्तित्व हमें यह स्मरण कराता है कि दर्शन का उद्देश्य पलायन नहीं, बल्कि जागरण है—आत्मा का भी और समाज का भी। महर्षि स्वामी दयानंद सरस्वती की जयंती पर उन्हें नमन करते हुए यही संकल्प सार्थक होगा कि हम सत्य, विवेक और मानव-कल्याण को अपने जीवन का आधार बनाएं।

प्राइवेट हॉस्पिटल और “इंश्योरेंस-आधारित लूट”

प्राइवेट हॉस्पिटल और “इंश्योरेंस-आधारित लूट”
राजेश अस्थाना अनंत

बीमार शरीर, बीमार व्यवस्था
भारत में बीमारी अब केवल शारीरिक संकट नहीं रही, वह एक आर्थिक आपदा बन चुकी है। और इस आपदा का सबसे बड़ा लाभार्थी बन चुका है — प्राइवेट हॉस्पिटल तंत्र। राज्यसभा में उठी यह बात कि “हॉस्पिटल को जैसे ही पता चलता है कि मरीज के पास इंश्योरेंस है, लूट का मीटर चालू हो जाता है”— कोई भावनात्मक आरोप नहीं, बल्कि लाखों परिवारों का जीता-जागता अनुभव है।

आज इलाज से पहले डॉक्टर नहीं, काउंटर पर बैठा बीमा-अधिकारी सवाल पूछता है —

“इंश्योरेंस है या नहीं?”

यही सवाल तय करता है कि मरीज को इलाज मिलेगा या पैकेज,
दवा मिलेगी या डील,
देखभाल होगी या बिलिंग।

इलाज नहीं, पैकेज बिकता है
जैसे ही मरीज ‘इंश्योर्ड’ घोषित होता है, इलाज एक मेडिकल प्रक्रिया नहीं रह जाता, वह एक कमर्शियल प्रोजेक्ट बन जाता है।

अनावश्यक टेस्ट

महंगी दवाएं

ICU में जरूरत से ज़्यादा दिन

मामूली बीमारी में भी “ऑब्ज़र्वेशन” के नाम पर भर्ती

डिस्चार्ज में जानबूझकर देरी

यह सब इसलिए नहीं कि मरीज की हालत नाज़ुक है, बल्कि इसलिए कि इंश्योरेंस की सीमा अभी बाकी है।

यदि मरीज 5 दिन में ठीक हो सकता है, तो उसे 10–15 दिन अस्पताल में रखा जाता है —
क्योंकि बीमारी नहीं, पॉलिसी की वैधता इलाज तय कर रही होती है।

डॉक्टर से पहले अकाउंटेंट
प्राइवेट हॉस्पिटल में आज डॉक्टर से ज़्यादा अहम भूमिका निभाता है —
अकाउंट्स डिपार्टमेंट।

इलाज का निर्णय मेडिकल साइंस नहीं, बल्कि यह तय करता है कि:

कौन सा टेस्ट इंश्योरेंस में क्लेम हो सकता है

कौन सी दवा बिल में जोड़ी जा सकती है

कौन सा प्रोसीजर “रिकमेंडेड” दिखाया जा सकता है

यहाँ मरीज रोगी नहीं, फाइल नंबर बन जाता है।

आम आदमी: दो तरफ़ से ठगा हुआ
जिसके पास इंश्योरेंस नहीं — वह इलाज से पहले ही हार जाता है।
जिसके पास इंश्योरेंस है — वह इलाज के नाम पर लूटा जाता है।

और अंत में?

क्लेम लिमिट खत्म

अगली बीमारी के लिए पॉलिसी महंगी

प्रीमियम बढ़ा हुआ

मानसिक और आर्थिक थकान अलग

यह कैसी विडंबना है कि बीमा सुरक्षा नहीं, शोषण का लाइसेंस बन चुका है।

सरकारी चुप्पी और नियमन की कमी
सबसे बड़ा सवाल यह नहीं कि प्राइवेट हॉस्पिटल ऐसा क्यों कर रहे हैं,
सबसे बड़ा सवाल है — उन्हें रोक कौन रहा है?

इलाज के रेट तय नहीं

टेस्ट की अनिवार्यता पर निगरानी नहीं

इंश्योरेंस क्लेम और मेडिकल आवश्यकता के बीच कोई स्वतंत्र ऑडिट नहीं

स्वास्थ्य व्यवस्था को बाजार के हवाले कर दिया गया है,
जहाँ मरीज ग्राहक है और बीमारी अवसर।

इलाज व्यापार नहीं, अधिकार है
स्वास्थ्य सेवा कोई लग्ज़री नहीं, मौलिक अधिकार है।
लेकिन जब हॉस्पिटल पाँच सितारा होटल से महंगे हो जाएं,
और बीमारी रूम कैटेगरी से तय हो —
तो समझ लीजिए व्यवस्था बीमार हो चुकी है।

अब क्या ज़रूरी है?

इलाज के मानक प्रोटोकॉल अनिवार्य हों

इंश्योरेंस आधारित इलाज पर स्वतंत्र मेडिकल ऑडिट

ICU, टेस्ट और भर्ती की अवधि पर कानूनी सीमाएं

मरीज को हर प्रक्रिया की लिखित वजह

सरकारी अस्पतालों को मजबूत करना — ताकि विकल्प रहे

निष्कर्ष
आज सवाल यह नहीं कि प्राइवेट हॉस्पिटल गलत कर रहे हैं या नहीं,
सवाल यह है कि हम कब तक इसे सामान्य मानते रहेंगे?

बीमारी शरीर की होती है,
पर लूट व्यवस्था की।

और जब तक इलाज मुनाफ़े का साधन रहेगा,
तब तक अस्पताल कम — कारोबारी केंद्र ज़्यादा रहेंगे।

सरकार को सोचना ही नहीं, कदम उठाना होगा।
क्योंकि अगला मरीज — कोई और नहीं, हम ही हो सकते हैं।
राजेश अस्थाना अनंत


राजनीति से परे थाली की सुरक्षा: खाद्य-मिलावट के खिलाफ साझा जिम्मेदारी

यह विषय किसी दल, नेता या विचारधारा से बड़ा है—यह सीधे नागरिकों के स्वास्थ्य, भरोसे और जीवन से जुड़ा है। जब कोई सांसद या जनप्रतिनिधि सार्वजनिक हित का मुद्दा उठाता है, तो उसे दलगत चश्मे से नहीं, लोकहित की कसौटी पर परखा जाना चाहिए। राज्यसभा सांसद राघव चड्ढा द्वारा खाद्य-मिलावट पर उठाई गई चिंता इसी श्रेणी में आती है।

आज स्थिति यह है कि बाज़ार में “शुद्धता”, “हाइजीन” और “क्वालिटी” के लेबल लगे उत्पादों के पीछे एक डरावनी सच्चाई छिपी है।
दूध में यूरिया, सब्ज़ियों में ऑक्सीटोसिन, पनीर में कॉस्टिक सोडा, मसालों में ईंट का पाउडर, पोल्ट्री में स्टेरॉयड और आइसक्रीम में डिटर्जेंट जैसी बातें अब अफ़वाह नहीं रहीं—ये जांचों में बार-बार उजागर हो चुकी हकीकतें हैं। विडंबना यह है कि जिन खाद्य वस्तुओं को कुछ देशों में पालतू जानवरों के लिए भी अनुपयुक्त माना जाता है, वही वस्तुएँ यहाँ “स्टैंडर्ड” के नाम पर बेची जा रही हैं।

यह समस्या केवल महानगरों तक सीमित नहीं है। आजमगढ़ जैसे जिलों में भी समय-समय पर खाद्य सुरक्षा विभाग द्वारा छापों में मिलावटी दूध, नकली पनीर, रंग-रसायन मिले मसाले और प्रतिबंधित केमिकल्स पकड़े जाने की खबरें सामने आती रही हैं। ये कार्रवाइयाँ यह बताने के लिए पर्याप्त हैं कि समस्या जमीनी और व्यापक है—और उपभोक्ता कहीं भी सुरक्षित नहीं।

इस मुद्दे पर संतुलन ज़रूरी है।

  • एक ओर निगरानी तंत्र की कमजोरी, सीमित संसाधन और ढीला प्रवर्तन है।
  • दूसरी ओर लालच, कम लागत में अधिक मुनाफ़ा और उपभोक्ताओं की जानकारी का अभाव।
  • साथ ही, ईमानदार उत्पादकों और व्यापारियों को भी उसी तराज़ू में तौला जाता है, जो अन्याय है।

समाधान भी राजनीति से ऊपर उठकर ही निकलेगा:

  1. कड़े और त्वरित दंड—लाइसेंस रद्दीकरण से लेकर आपराधिक मुक़दमे तक।
  2. नियमित, पारदर्शी और स्वतंत्र जांच—रैंडम सैंपलिंग, सार्वजनिक रिपोर्टिंग।
  3. उपभोक्ता जागरूकता—क्या देखें, कैसे पहचानें, कहाँ शिकायत करें।
  4. ईमानदार कारोबारियों का संरक्षण—ताकि वे प्रतिस्पर्धा में न पिसें।
  5. तकनीक का उपयोग—ट्रेसबिलिटी, QR-आधारित जांच, मोबाइल लैब्स।

खाद्य-मिलावट पर चुप्पी, असहमति या राजनीतिक शोर—तीनों ही खतरनाक हैं। ज़रूरत है साझा संकल्प की। अगर आज हम राजनीति से ऊपर उठकर समर्थन नहीं करेंगे, तो कल इसकी कीमत अस्पतालों की कतारों और घटती उम्र से चुकानी पड़ेगी।
यह मुद्दा विपक्ष-सत्ता का नहीं, थाली में ज़हर बनाम जीवन का है।

गणतंत्र दिवस 26 जनवरी 2026

🇮🇳 गणतंत्र दिवस 26 जनवरी 2026 : हार्दिक शुभकामनाएँ 🇮🇳
राजेश अस्थाना अनंत

26 जनवरी भारतीय लोकतंत्र की आत्मा का उत्सव है—वह दिन जब भारत ने स्वयं को सम्प्रभु, समाजवादी, पंथनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक गणराज्य घोषित कर संविधान को अपने जीवन-मूल्य का आधार बनाया। यह केवल एक तिथि नहीं, बल्कि संघर्ष, संकल्प और समानता की जीवंत परंपरा है।

भारतीय गणतंत्र की प्रमुख उपलब्धियाँ
पिछले दशकों में भारतीय गणतंत्र ने अनेक ऐतिहासिक उपलब्धियाँ अर्जित की हैं।
हमने विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र बनकर यह सिद्ध किया कि विविध भाषाएँ, धर्म, संस्कृतियाँ और विचार एक साझा संवैधानिक ढाँचे में समरस हो सकते हैं।
संविधान ने हर नागरिक को समान अधिकार, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सामाजिक न्याय का भरोसा दिया।

आर्थिक क्षेत्र में भारत ने आत्मनिर्भरता की ओर मजबूत कदम बढ़ाए—डिजिटल इंडिया, स्टार्टअप क्रांति, विज्ञान व अंतरिक्ष में ऐतिहासिक उपलब्धियाँ, और वैश्विक मंच पर भारत की बढ़ती भूमिका इसका प्रमाण हैं।
शिक्षा, स्वास्थ्य, महिला सशक्तिकरण, सामाजिक समावेशन और तकनीकी नवाचार के क्षेत्रों में निरंतर प्रगति ने जन-जीवन को नई दिशा दी है।
लोकतांत्रिक संस्थाओं की मजबूती, शांतिपूर्ण सत्ता हस्तांतरण और जनभागीदारी ने भारतीय गणतंत्र की परिपक्वता को विश्व के सामने स्थापित किया है।

आगामी अपेक्षाएँ और संकल्प
आगामी वर्षों में हम एक ऐसे भारत की अपेक्षा करते हैं जहाँ—
न्याय केवल संवैधानिक शब्द न रहे, बल्कि हर नागरिक के जीवन का अनुभव बने।
शिक्षा और स्वास्थ्य समान रूप से सुलभ हों,
युवा शक्ति को नवाचार और रोजगार के अवसर मिलें,
और विकास के साथ पर्यावरण-संतुलन भी सुरक्षित रहे।

हमें यह संकल्प लेना होगा कि हम संविधान के मूल्यों—न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व—को केवल स्मरण न करें, बल्कि अपने आचरण में उतारें।

आइए, इस गणतंत्र दिवस पर हम सब मिलकर यह प्रण लें कि हम अपने कर्तव्यों के प्रति उतने ही सजग रहेंगे जितने अपने अधिकारों के प्रति—तभी भारतीय गणतंत्र और अधिक सशक्त, समावेशी और उज्ज्वल बनेगा।

आप सभी को 26 जनवरी 2026 के पावन अवसर पर गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ।
जय हिंद! 🇮🇳
राजेश अस्थाना अनंत


नेताजी सुभाष चंद्र बोस : व्यक्तित्व, कृतित्व, संघर्ष और वर्तमान प्रासंगिकता

नेताजी सुभाष चंद्र बोस : व्यक्तित्व, कृतित्व, संघर्ष और वर्तमान प्रासंगिकता
राजेश अस्थाना अनंत

भारत के स्वतंत्रता संग्राम में जिन व्यक्तित्वों ने अपने अदम्य साहस, वैचारिक दृढ़ता और क्रांतिकारी संकल्प से इतिहास की दिशा बदली, उनमें नेताजी सुभाष चंद्र बोस का नाम स्वर्णाक्षरों में अंकित है। 23 जनवरी को मनाई जाने वाली उनकी जयंती केवल एक महान नेता की स्मृति नहीं, बल्कि राष्ट्र के आत्मसम्मान, त्याग और संपूर्ण स्वतंत्रता के स्वप्न का उत्सव है।

1. नेताजी का व्यक्तित्व : विचार, साहस और अनुशासन का संगम
सुभाष चंद्र बोस का व्यक्तित्व बहुआयामी था। वे तेजस्वी बुद्धि, अपार आत्मविश्वास और कठोर अनुशासन के प्रतीक थे। आई.सी.एस. जैसी प्रतिष्ठित सेवा को त्याग देना उनके चरित्र की असाधारण दृढ़ता को दर्शाता है।
उनका व्यक्तित्व केवल एक राजनेता का नहीं, बल्कि एक विचारक, संगठनकर्ता, सैनिक नेता और राष्ट्रभक्त दार्शनिक का था। वे भावुक राष्ट्रवाद के साथ-साथ व्यावहारिक रणनीति के पक्षधर थे।
उनका प्रसिद्ध उद्घोष— “तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आज़ादी दूँगा”—उनके निर्भीक, बलिदानी और कर्मप्रधान व्यक्तित्व का सार प्रस्तुत करता है।

2. नेताजी के कार्य : संगठन, संघर्ष और क्रांति
नेताजी ने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन को नई ऊर्जा और दिशा प्रदान की। उनके प्रमुख कार्यों में—

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में नेतृत्व : वे कांग्रेस के अध्यक्ष बने और पार्टी में अधिक सक्रिय, आक्रामक और निर्णायक भूमिका के समर्थक रहे।

फॉरवर्ड ब्लॉक की स्थापना : वैचारिक मतभेदों के कारण उन्होंने कांग्रेस से अलग होकर फॉरवर्ड ब्लॉक का गठन किया, ताकि स्वतंत्रता आंदोलन को क्रांतिकारी गति मिल सके।

आजाद हिंद फौज का गठन : उनका सबसे ऐतिहासिक योगदान आज़ाद हिंद फौज (INA) का पुनर्गठन और नेतृत्व था।

अंतरराष्ट्रीय समर्थन : उन्होंने जर्मनी, जापान और दक्षिण-पूर्व एशिया में भारत की आज़ादी के लिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग जुटाया।

आजाद हिंद सरकार : 1943 में सिंगापुर में स्वतंत्र भारत की अस्थायी सरकार की स्थापना, जिसमें उन्होंने राष्ट्रीय ध्वज फहराया और शासन की संरचना खड़ी की।


3. भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में भूमिका
जहाँ महात्मा गांधी अहिंसा के मार्ग से स्वतंत्रता के पक्षधर थे, वहीं नेताजी सुभाष चंद्र बोस सशस्त्र संघर्ष को भी आवश्यक मानते थे।
उन्होंने ब्रिटिश साम्राज्यवाद को उसकी सैन्य शक्ति के स्तर पर चुनौती दी। आज़ाद हिंद फौज का नारा— “दिल्ली चलो”—भारतीय जनमानस में स्वाधीनता की तीव्र आकांक्षा का प्रतीक बन गया।
उनके प्रयासों ने ब्रिटिश सरकार की नींव हिला दी। INA के सैनिकों पर चलाए गए मुकदमों ने देशव्यापी जनआंदोलन को जन्म दिया, जिसने अंततः ब्रिटिश सत्ता के अंत को तेज किया।

4. नेताजी की विचारधारा
नेताजी एक ऐसे भारत की कल्पना करते थे—

जो सामाजिक रूप से न्यायपूर्ण हो

आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर हो

राजनीतिक रूप से सशक्त और स्वतंत्र हो

जहाँ धर्म, जाति और भाषा से ऊपर उठकर राष्ट्रीय एकता स्थापित हो

वे अनुशासित लोकतंत्र और समाजवादी झुकाव के समर्थक थे, जिसमें राष्ट्रहित सर्वोपरि हो।

5. वर्तमान समय में नेताजी की प्रासंगिकता
आज के भारत में सुभाष चंद्र बोस की प्रासंगिकता और भी अधिक बढ़ जाती है—

राष्ट्रीय एकता और अखंडता के लिए उनका विचार आज भी प्रेरक है।

युवा शक्ति के लिए उनका साहस, अनुशासन और कर्तव्यनिष्ठा आदर्श है।

आत्मनिर्भर भारत की अवधारणा उनके स्वप्न से गहराई से जुड़ी है।

सिद्धांत और कर्म की एकता—जो आज के सार्वजनिक जीवन में दुर्लभ होती जा रही है—नेताजी के जीवन का मूल मंत्र था।

गोपाल प्रसाद व्यास द्वारा रचित नेताजी सुभाष चंद्र बोस पर आधारित प्रेरक कविता में यह स्पष्ट रूप से उभरता है कि नेताजी केवल एक सेनानायक नहीं, बल्कि जन-जन में आज़ादी की ज्वाला जगाने वाले महापुरुष थे। कविता में उनके ओजस्वी व्यक्तित्व, निर्भीक नेतृत्व और बलिदान की भावना का सजीव चित्रण है। वह युवाओं को संघर्ष, आत्मसम्मान और राष्ट्रहित के लिए उठ खड़े होने का आह्वान करते हैं।

वह ख़ून कहो किस मतलब का
जिसमें उबाल का नाम नहीं
वह ख़ून कहो किस मतलब का
आ सके देश के काम नहीं

वह ख़ून कहो किस मतलब का
जिसमें जीवन न रवानी है
जो परवश में होकर बहता है
वह ख़ून नहीं है पानी है

उस दिन लोगों ने सही सही
खूँ की कीमत पहचानी थी
जिस दिन सुभाष ने बर्मा में
मांगी उनसे कुर्बानी थी

बोले स्वतंत्रता की खातिर
बलिदान तुमहे करना होगा
बहुत जी चुके हो जग में
लेकिन आगे मरना होगा

आजादी के चरणों में जो
जयमाल चढाई जाएगी
वह सुनो तुम्हारे शीशों के
फूलों से गूंथी जाएगी

आज़ादी का संग्राम कहीं
पैसे पर खेला जाता है?
ये शीश कटाने का सौदा
नंगे सर झेला जाता है

आज़ादी का इतिहास कहीं
काली स्याही लिख पाती है?
इसको पाने को वीरों ने
खून की नदी बहाई जाती है

यह कहते कहते वक्ता की
आंखों में खून उतर आया
मुख रक्त वर्ण हो दमक उठा
चमकी उनकी रक्तिम काया

आजानु बाहु ऊंचा करके
वे बोले रक्त मुझे देना
इसके बदले में भारत की
आज़ादी तुम मुझसे लेना

हो गई सभा में उथल पुथल
सीने में दिल न समाते थे
स्वर इंकलाब के नारों के
कोसों तक झाए जाते थे

हम देंगे देंगे ख़ून
स्वर बस यही सुनाई देते थे
रण में जाने को युवक
खड़े तैयार दिखाई देते थे

बोले सुभाष इस तरह नहीं
बातों से मतलब सरता है
मैं कलम बढ़ता हूँ, आये
जो खूनी हस्ताक्षर करता है

इसको भरने वाले जन को
सर्वस्व समर्पण करना है
अपना तन-मन-धन-जन-जीवन
माता को अर्पण करना है

पर यह साधारण पत्र नहीं
आज़ादी का परवाना है
इसपर तुमको अपने तन का
कुछ उज्ज्वल रक्त गिराना है

वह आगे आए जिसकी रग में
खून भारतीय बहता है
वह आगे आए जो ख़ुद को
हिन्दुस्तानी कहता है

वह आगे आए जो इसपर
खूनी हस्ताक्षर देता है
मैं कफन बढाता हूँ आए
जो इसको हँसकर लेता है

सारी जनता हुंकार उठी
हम आते हैं, हम आते हैं
माता के चरणों में लो
हम अपना रक्त चढाते हैं

साहस से बढे युवक उस दिन
देखा बढते ही आते थे
चाकू छुरी कटारियों से
वे अपना रक्त गिराते थे

फिर उसी रक्त की स्याही में
वे अपना कलम डुबोते थे
आज़ादी के परवाने पर
हस्ताक्षर करते जाते थे

उस दिन तारों ने देखा था
हिन्दुस्तानी विश्वास नया
लिखा था जब रणवीरों ने
खूँ से अपना इतिहास नया


उपसंहार
नेताजी सुभाष चंद्र बोस केवल एक ऐतिहासिक व्यक्तित्व नहीं, बल्कि भारत की आत्मा की आवाज़ थे। उनका जीवन हमें सिखाता है कि स्वतंत्रता केवल अधिकार नहीं, बल्कि त्याग, साहस और निरंतर संघर्ष की परिणति होती है।
उनकी जयंती पर उन्हें स्मरण करना तभी सार्थक होगा, जब हम उनके आदर्शों—राष्ट्रभक्ति, अनुशासन, साहस और सामाजिक न्याय—को अपने जीवन और राष्ट्रनिर्माण में उतार सकें।

नेताजी अमर हैं—अपने विचारों में, अपने संघर्ष में और भारत के भविष्य में।
राजेश अस्थाना अनंत


रास बिहारी बोस : स्वतंत्रता संग्राम के अंतरराष्ट्रीय शिल्पकार

रास बिहारी बोस : स्वतंत्रता संग्राम के अंतरराष्ट्रीय शिल्पकार
राजेश अस्थाना अनंत

महान क्रांतिकारी रास बिहारी बोस भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के उन अग्रदूतों में हैं, जिन्होंने संघर्ष को केवल देश की सीमाओं तक नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय धरातल तक पहुँचाया। उनकी पुण्यतिथि पर उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए, स्वतंत्रता आंदोलन में उनकी भूमिका की विस्तृत समीक्षा अत्यंत आवश्यक है।

रास बिहारी बोस (1886–1945) का नाम भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के उस अध्याय से जुड़ा है, जहाँ क्रांति, संगठन, कूटनीति और दूरदर्शिता एक साथ दिखाई देती है। वे केवल एक क्रांतिकारी नहीं थे, बल्कि एक रणनीतिक चिंतक, संगठनकर्ता और विचारधारा के वाहक थे, जिन्होंने भारत की आज़ादी की लड़ाई को एशिया के मंच तक पहुँचाया।

1. प्रारंभिक जीवन और क्रांतिकारी चेतना
रास बिहारी बोस का जन्म बंगाल में हुआ। आरंभ से ही उनमें औपनिवेशिक शासन के प्रति तीव्र असंतोष था। वे अनुशीलन समिति और युगांतर जैसे क्रांतिकारी संगठनों से जुड़े और युवाओं को संगठित करने में सक्रिय रहे। उनका उद्देश्य केवल प्रतिकार नहीं, बल्कि सशस्त्र और संगठित क्रांति के माध्यम से स्वतंत्रता प्राप्त करना था।

2. गदर और दिल्ली षड्यंत्र
1912 में लॉर्ड हार्डिंग पर बम प्रहार (दिल्ली षड्यंत्र) में रास बिहारी बोस की प्रमुख भूमिका रही। यद्यपि यह प्रयास सफल नहीं हुआ, परंतु इस घटना ने ब्रिटिश शासन को यह स्पष्ट संकेत दे दिया कि भारत में क्रांति की आग सुलग चुकी है।
इसके बाद 1915 के गदर आंदोलन में भी उन्होंने केंद्रीय भूमिका निभाई। इस आंदोलन का लक्ष्य था – ब्रिटिश सेना के भारतीय सिपाहियों में विद्रोह कराकर सत्ता पलटना।

3. जापान प्रवास और अंतरराष्ट्रीय रणनीति
ब्रिटिश सरकार की कड़ी निगरानी से बचते हुए रास बिहारी बोस जापान पहुँचे। यहीं से उनके योगदान का एक नया और अत्यंत महत्वपूर्ण अध्याय आरंभ होता है।
जापान में रहते हुए उन्होंने न केवल अपनी पहचान बनाए रखी, बल्कि भारतीय स्वतंत्रता के पक्ष में जापानी समाज, बुद्धिजीवियों और राजनीतिक नेतृत्व को प्रभावित किया। यह उस समय असाधारण कार्य था।

4. आज़ाद हिन्द आंदोलन की आधारशिला
रास बिहारी बोस ही वह सेतु थे, जिन्होंने प्रवासी भारतीयों को संगठित कर आजाद हिन्द फौज की वैचारिक और संगठनात्मक नींव रखी।
उन्होंने इंडियन इंडिपेंडेंस लीग का गठन किया, जिसका उद्देश्य था – विदेशों में बसे भारतीयों को आज़ादी के लिए एकजुट करना।

यही वह मंच था, जिसने आगे चलकर नेताजी सुभाष चंद्र बोस को नेतृत्व प्रदान किया। रास बिहारी बोस ने अत्यंत विनम्रता और दूरदर्शिता के साथ नेतृत्व नेताजी को सौंपा, जो उनके महान व्यक्तित्व का प्रमाण है।

5. नेताजी और रास बिहारी बोस : वैचारिक निरंतरता
रास बिहारी बोस को नेताजी का मार्गदर्शक और प्रेरणास्रोत कहा जाए तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। उन्होंने नेताजी को न केवल संगठन सौंपा, बल्कि एक स्पष्ट लक्ष्य, अंतरराष्ट्रीय समर्थन और सशस्त्र संघर्ष की दिशा भी दी।
आजाद हिन्द फौज का जो स्वरूप हमें दिखाई देता है, उसकी जड़ें रास बिहारी बोस के चिंतन और प्रयासों में निहित हैं।

6. त्याग, तपस्या और विरासत
रास बिहारी बोस का जीवन व्यक्तिगत सुख, परिवार और मातृभूमि से दूर रहकर बीता। वे जीवन भर भारत लौट नहीं सके, परंतु उनका हृदय भारत की आज़ादी के लिए धड़कता रहा।
1945 में जापान में उनका निधन हुआ, परंतु वे स्वतंत्र भारत की नींव रखने वालों में सदा स्मरणीय रहेंगे।

निष्कर्ष
रास बिहारी बोस भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के अल्प-चर्चित किंतु अत्यंत महत्वपूर्ण नायक हैं। उन्होंने यह सिद्ध किया कि स्वतंत्रता की लड़ाई केवल देश के भीतर ही नहीं, बल्कि वैश्विक मंच पर भी लड़ी जा सकती है।
उनका योगदान यह सिखाता है कि क्रांति केवल आवेग नहीं, संगठन, धैर्य और दूरदृष्टि का परिणाम होती है।

उनकी पुण्यतिथि पर हम उन्हें नमन करते हुए यह स्वीकार करते हैं कि
स्वाधीन भारत के स्वर्णिम इतिहास में रास बिहारी बोस का नाम अमिट है।
राजेश अस्थाना अनंत


“जेलेसी वाला नेचर: भगवान की देन या खुद की मेहनत?”





“जेलेसी वाला नेचर: भगवान की देन या खुद की मेहनत?”
राजेश अस्थाना अनंत

कुछ लोग ऐसे होते हैं जिनकी डिग्री जन्म प्रमाण-पत्र के साथ ही छपी होती है—
नाम के आगे नहीं,
सीधे स्वभाव के पीछे लिखा होता है:
“स्पेशलाइज़ेशन: जेलेसी”।

बचपन में अगर किसी बच्चे के हाथ में दो टॉफियाँ हों,
तो ये तीसरे को ढूँढने लगते हैं—
“इसको ज़्यादा क्यों मिली?”
स्कूल में क्लास टॉपर नहीं बने,
तो खुद की मेहनत पर नहीं,
टॉपर की किस्मत पर शक करते हैं।
“ज़रूर टीचर का दूर का रिश्तेदार होगा!”

इनकी जेलेसी बहुआयामी होती है—
पड़ोसी ने नया फ्रिज लिया तो
इनका बीपी बढ़ जाता है।
दोस्त ने वजन कम किया तो
डाइट नहीं,
नज़र लगा देते हैं।
और अगर कोई खुश दिख जाए,
तो ये गंभीर होकर कहते हैं—
“कुछ ना कुछ गड़बड़ ज़रूर है।”

सोशल मीडिया तो इनके लिए
प्रैक्टिकल लैब है।
दूसरे की सफलता देख कर
लाइक नहीं करते,
सीधे आत्मा से सवाल करते हैं—
“इसमें ऐसा क्या खास है?”
पोस्ट पर कमेंट भले न करें,
लेकिन मन में पीएचडी लेवल विश्लेषण
पूरा हो चुका होता है।

सबसे मज़ेदार बात ये कि
ये लोग खुद को
सबसे भोला और सच्चा इंसान समझते हैं।
इनके अनुसार दुनिया के सारे लोग
या तो नकली हैं
या उनसे आगे निकल गए हैं—
और दोनों ही बातें
अक्षम्य अपराध हैं।

कभी-कभी लगता है
ये लोग जेलेसी लेकर पैदा नहीं हुए,
बल्कि कहीं कोई
“ईर्ष्या इंस्टिट्यूट” है,
जहाँ सिखाया जाता है—
“दूसरों की खुशी कैसे सहन न करें”
और पास होने पर
जन्म के साथ ही नियुक्ति मिल जाती है।

ख़ैर, ऐसे लोगों से लड़ने का
एक ही इलाज है—
खुश रहो, आगे बढ़ो,
और मुस्कुरा कर देखो।
क्योंकि आपकी मुस्कान
इनके लिए वही है
जो मिर्च बिना नमक के—
सीधे असर करती है! 😄

राजेश अस्थाना अनंत