विनायक दामोदर सावरकर : राष्ट्र, इतिहास और राजनीति के त्रिकोण में एक दार्शनिक विमर्श
राजेश अस्थाना अनंत
भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन केवल घटनाओं का क्रम नहीं था, वह विचारों, त्याग और आत्मसंघर्ष की एक विराट प्रयोगशाला भी था। इस प्रयोगशाला में कुछ व्यक्तित्व ऐसे थे जो केवल अपने समय के नहीं, बल्कि आने वाली शताब्दियों के प्रश्नों को भी जन्म देते हैं। विनायक दामोदर सावरकर ऐसे ही युगद्रष्टा थे—जिनका जीवन राष्ट्रसेवा, बौद्धिक साहस और असंख्य अमानवीय यातनाओं की तपश्चर्या से निर्मित हुआ।
सावरकर का योगदान केवल क्रांतिकारी गतिविधियों तक सीमित नहीं था। उन्होंने स्वतंत्रता को राजनीतिक सत्ता-हस्तांतरण से आगे बढ़कर राष्ट्रीय चेतना के रूप में देखा। उनके लिए स्वतंत्रता का अर्थ था—मानसिक दासता से मुक्ति, आत्मसम्मान की पुनर्स्थापना और राष्ट्र को एक सांस्कृतिक-ऐतिहासिक इकाई के रूप में समझना। सेल्युलर जेल की कालकोठरी में बिताए गए वर्ष केवल शारीरिक यातना नहीं थे, वे उस विचार की परीक्षा थे कि क्या मनुष्य का संकल्प सत्ता और क्रूरता से बड़ा हो सकता है। सावरकर ने सिद्ध किया कि विचारों को जंजीरों में नहीं बांधा जा सकता।
दार्शनिक दृष्टि से देखें तो सावरकर का राष्ट्रवाद भावुकता नहीं, बल्कि चेतन बोध था। वे इतिहास को स्मृति के रूप में नहीं, उत्तरदायित्व के रूप में देखते थे। उनका आग्रह था कि राष्ट्र अपनी कमजोरियों को स्वीकार करे, अपनी शक्तियों को पहचाने और भविष्य का निर्माण आत्मगौरव के साथ करे। यह दृष्टि उन्हें कई समकालीन धाराओं से अलग करती है—जहाँ स्वतंत्रता को केवल सत्ता-प्राप्ति का साधन माना गया।
परंतु स्वतंत्रता के पश्चात इतिहास ने एक विचित्र मोड़ लिया। जिन व्यक्तित्वों का मूल्यांकन स्वतंत्र भारत में होना चाहिए था, वह राजनीतिक निहितार्थों और वैचारिक ध्रुवीकरण की भेंट चढ़ गया। सावरकर का मूल्यांकन भी उनके समग्र जीवन और चिंतन के बजाय चयनात्मक दृष्टि से किया गया। यहाँ प्रश्न उठता है—क्या इतिहास का काम न्याय करना है या राजनीति के लिए प्रमाण जुटाना? जब इतिहास सत्ता के औज़ार में बदल जाता है, तब युगद्रष्टा व्यक्तित्व ‘विवाद’ में और राष्ट्र ‘विस्मृति’ में चला जाता है।
दार्शनिक स्तर पर यह स्थिति हमें एक गहरे संकट की ओर संकेत करती है—स्मृति बनाम सुविधा का संकट। सावरकर जैसे व्यक्तित्व स्मृति की माँग करते हैं, जबकि राजनीति सुविधा की। परिणामस्वरूप, उनके योगदान को या तो अतिरंजना में बदला गया या उपेक्षा में ढकेल दिया गया। यह न केवल सावरकर के साथ अन्याय है, बल्कि राष्ट्र की आत्मा के साथ भी।
सावरकर की पुण्यतिथि हमें किसी एक मत को स्वीकार या अस्वीकार करने का अवसर नहीं, बल्कि यह प्रश्न पूछने का अवसर देती है कि क्या हम अपने इतिहास को समग्रता में देखने का साहस रखते हैं? क्या हम उन व्यक्तित्वों को स्वीकार कर सकते हैं जो सरल नहीं, जटिल हैं—परंतु ईमानदार हैं? राष्ट्र का निर्माण केवल सर्वसम्मति से नहीं, बल्कि असहमति को समझने की क्षमता से भी होता है।
अंततः, सावरकर एक व्यक्ति नहीं, एक प्रश्न हैं—राष्ट्र से, इतिहास से और हमसे। उन्हें नमन करना केवल पुष्पांजलि अर्पित करना नहीं, बल्कि उस वैचारिक स्वतंत्रता को सम्मान देना है जिसके लिए उन्होंने अपना जीवन अर्पित कर दिया। जब तक हम उन्हें राजनीतिक चश्मे से नहीं, दार्शनिक विवेक से देखेंगे, तब तक न तो सावरकर को समझ पाएँगे, न स्वयं को।
राजेश अस्थाना अनंत
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विनायक दामोदर सावरकर : राष्ट्र, इतिहास और राजनीति के त्रिकोण में एक दार्शनिक विमर्श
छत्रपति शिवाजी महाराज : संघर्ष, स्वराज और स्वाभिमान का दार्शनिक घोष
छत्रपति शिवाजी महाराज : संघर्ष, स्वराज और स्वाभिमान का दार्शनिक घोष
राजेश अस्थाना अनंत
जब हौसले बुलंद हों, तो पहाड़ भी मिट्टी का ढेर लगते हैं—यह पंक्ति केवल प्रेरक कथन नहीं, बल्कि छत्रपति शिवाजी महाराज के सम्पूर्ण जीवन-दर्शन का सार है। उनका जीवन एक योद्धा की कथा भर नहीं, बल्कि संघर्ष, विवेक, नीति और आत्मसम्मान पर आधारित एक गहन दार्शनिक यात्रा है।
1. संघर्ष से संस्कार तक
शिवाजी महाराज का जन्म एक ऐसे समय में हुआ जब भारत राजनीतिक अस्थिरता, विदेशी आक्रमणों और आंतरिक विघटन से जूझ रहा था। उन्होंने बाल्यावस्था से ही यह समझ लिया था कि स्वतंत्रता केवल तलवार से नहीं, बल्कि चेतना, संगठन और नैतिक बल से प्राप्त होती है। उनकी माता जिजाऊ द्वारा दिए गए संस्कारों ने उन्हें यह सिखाया कि शक्ति का उद्देश्य शोषण नहीं, संरक्षण है।
2. हिन्द स्वराज : सत्ता नहीं, स्वाभिमान
शिवाजी महाराज द्वारा प्रतिपादित हिन्द स्वराज का विचार केवल एक राज्य-व्यवस्था नहीं था, बल्कि आत्मनिर्भरता और सांस्कृतिक स्वाभिमान का घोष था। उनके लिए स्वराज का अर्थ था—ऐसा शासन जहाँ न्याय, धर्म और लोककल्याण सर्वोपरि हों। यह दर्शन आज के लोकतांत्रिक मूल्यों से भी कहीं गहरा और मानवीय दिखाई देता है।
3. युद्धनीति और नैतिकता का संतुलन
शिवाजी महाराज को सर्वश्रेष्ठ रणनीतिकार इसलिए नहीं कहा जाता कि उन्होंने युद्ध जीते, बल्कि इसलिए कि उन्होंने युद्ध को अंतिम विकल्प माना। उनकी गुरिल्ला युद्धनीति परिस्थितियों के अनुकूल बुद्धि के प्रयोग का उदाहरण है। साथ ही, स्त्रियों, साधुओं और सामान्य नागरिकों के प्रति उनका सम्मान यह सिद्ध करता है कि नीति विहीन विजय, पराजय से भी निकृष्ट होती है।
4. धर्मरक्षा का व्यापक अर्थ
शिवाजी महाराज का धर्म केवल पूजा-पद्धति तक सीमित नहीं था। उनके लिए धर्म का अर्थ था—न्याय, करुणा, सत्य और कर्तव्य। वे किसी भी धर्म के विरुद्ध नहीं थे, बल्कि अधर्म और अत्याचार के विरुद्ध थे। यही कारण है कि उनके प्रशासन में विभिन्न समुदायों को सम्मान और सुरक्षा प्राप्त थी।
5. नेतृत्व का दार्शनिक आदर्श
शिवाजी महाराज का नेतृत्व भय पर नहीं, विश्वास पर आधारित था। वे स्वयं कष्ट सहते थे, पर प्रजा पर बोझ नहीं डालते थे। यह नेतृत्व का वह आदर्श है जहाँ राजा सेवक होता है और सत्ता साधन, साध्य नहीं।
6. आज के संदर्भ में शिवाजी दर्शन
आज जब राष्ट्र, समाज और व्यक्ति अनेक स्तरों पर संकट से गुजर रहे हैं, शिवाजी महाराज का जीवन हमें यह सिखाता है कि
स्वतंत्रता का आधार आत्मसम्मान है,
शक्ति का मूल्य नैतिकता से तय होता है,
और संस्कृति जीवित रहती है संघर्ष से, समझौते से नहीं।
निष्कर्ष
छत्रपति शिवाजी महाराज इतिहास के पन्नों में बंद कोई चरित्र नहीं, बल्कि साहस, विवेक और राष्ट्रधर्म की जीवित चेतना हैं। उनका जीवन हमें बताता है कि यदि उद्देश्य पवित्र हो और संकल्प अडिग, तो सीमित संसाधन भी असाधारण परिणाम दे सकते हैं।
जय भवानी।
जय शिवाजी।
राजेश अस्थाना अनंत
स्वामी रामकृष्ण परमहंस : भक्ति, साधना और समन्वय का दार्शनिक प्रकाश
स्वामी रामकृष्ण परमहंस : भक्ति, साधना और समन्वय का दार्शनिक प्रकाश
राजेश अस्थाना अनंत
भारतीय आध्यात्मिक परंपरा में स्वामी रामकृष्ण परमहंस का व्यक्तित्व किसी एक संप्रदाय, दर्शन या पूजा-पद्धति में सीमित नहीं है। वे स्वयं एक जीवंत प्रयोगशाला थे, जहाँ भक्ति, ज्ञान, कर्म और योग—सभी धाराएँ एक साथ प्रवाहित होती हैं। माँ काली के अनन्य उपासक होकर भी वे निराकार ब्रह्म के साक्षात्कारकर्ता थे; इसीलिए उनका जीवन अनुभवजन्य दर्शन (Experiential Philosophy) का सर्वोच्च उदाहरण बनता है।
भक्ति से अद्वैत तक : अनुभव का दर्शन
रामकृष्ण परमहंस के लिए ईश्वर कोई बौद्धिक अवधारणा नहीं, बल्कि प्रत्यक्ष अनुभूति थे। उनकी भक्ति भावुकता नहीं, बल्कि आत्म-विसर्जन थी—जहाँ अहं का पूर्ण क्षय होकर साधक और साध्य का भेद मिट जाता है। उन्होंने वैष्णव भक्ति, शाक्त साधना, अद्वैत वेदान्त, इस्लाम और ईसाई साधना—सबको स्वयं जीकर सिद्ध किया कि सत्य एक है, मार्ग अनेक।
यहाँ दर्शन ग्रंथों से नहीं, साधना के तप से जन्म लेता है। रामकृष्ण का अद्वैत शुष्क तर्क नहीं, बल्कि करुणा से भीगा हुआ अद्वैत है—जहाँ हर जीव में ईश्वर की उपस्थिति देखी जाती है।
मानवता और समरसता की दृष्टि
उनकी साधना का अंतिम निष्कर्ष सामाजिक समरसता में प्रकट होता है। वे जाति, धर्म, भाषा और लिंग के भेदों को आध्यात्मिक अज्ञान का परिणाम मानते थे। उनके लिए मानव-सेवा ही ईश्वर-सेवा थी—पर उपदेश के रूप में नहीं, स्वाभाविक करुणा के रूप में।
यही कारण है कि उनका दर्शन किसी मठ की चारदीवारी में बंद नहीं रहा; वह आगे चलकर समाज-सेवा, शिक्षा और राष्ट्र-निर्माण के रूप में फला-फूला।
गुरु–शिष्य का अद्वितीय संबंध : रामकृष्ण और विवेकानंद
स्वामी विवेकानंद का निर्माण
रामकृष्ण परमहंस और स्वामी विवेकानंद का संबंध केवल गुरु–शिष्य का नहीं, बल्कि चेतना के हस्तांतरण का संबंध है। जहाँ रामकृष्ण स्वयं समाधि में लीन रहने वाले संत थे, वहीं विवेकानंद कर्मभूमि में उतरने वाले सिंह थे।
युवा नरेन्द्र (विवेकानंद) तर्कशील थे, प्रश्नाकुल थे, ईश्वर को प्रमाण के तराजू पर तौलना चाहते थे। रामकृष्ण ने उन्हें दर्शन नहीं समझाया—उन्होंने ईश्वर को दिखाया। यही वह क्षण था जहाँ तर्क अनुभव के आगे नतमस्तक हुआ।
पूरक व्यक्तित्व
रामकृष्ण — अंतर्मुखी, भावसमाधि में स्थित, साधना के शिखर पर
विवेकानंद — बहिर्मुखी, ओजस्वी, कर्म और संगठन के प्रतीक
रामकृष्ण ने विवेकानंद को वह आध्यात्मिक आधार दिया, जिससे वे संसार का सामना कर सकें; और विवेकानंद ने गुरु की अनुभूति को वैश्विक भाषा दी—शिकागो से लेकर भारत के गाँवों तक।
दर्शन का सामाजिक विस्तार
रामकृष्ण का वाक्य— “जीव में शिव की सेवा”—विवेकानंद के हाथों रामकृष्ण मिशन की सेवा-दृष्टि बना। यहाँ साधना पलायन नहीं, बल्कि समाज में उतरकर पीड़ा हरने का संकल्प बनी।
दार्शनिक निष्कर्ष
स्वामी रामकृष्ण परमहंस भारतीय दर्शन की उस धारा के प्रतिनिधि हैं जहाँ अनुभव सर्वोपरि है। उन्होंने सिद्ध किया कि आध्यात्मिकता विभाजन नहीं, समन्वय सिखाती है; और विवेकानंद के माध्यम से यह दर्शन विश्व-मानवता का मार्गदर्शक बना।
रामकृष्ण बीज थे, विवेकानंद वटवृक्ष।
गुरु मौन थे, शिष्य वाणी।
पर दोनों की चेतना एक ही थी—
मानव में नारायण की खोज।
राजेश अस्थाना अनंत
14 फ़रवरी : प्रेम का दिन, स्मृति का दिन, प्रश्नों का दिन
महर्षि स्वामी दयानंद सरस्वती : वैदिक चेतना का पुनर्जागरण
महर्षि स्वामी दयानंद सरस्वती : वैदिक चेतना का पुनर्जागरण
राजेश अस्थाना अनंत 
महर्षि स्वामी दयानंद सरस्वती भारतीय चिंतन-परंपरा के उन विरल महापुरुषों में हैं, जिनके लिए दर्शन केवल विचार नहीं, बल्कि जीवन-पद्धति था। वे वैदिक चेतना के महान उद्घोषक थे, जिन्होंने जड़ परंपराओं, अंधविश्वासों और सामाजिक जड़ता के विरुद्ध सत्य, तर्क और आत्मबोध का निर्भीक शंखनाद किया। उनका दर्शन मनुष्य को बाह्य आडंबर से मुक्त कर अंतःकरण की शुद्धि और विवेक की ओर उन्मुख करता है।
स्वामी दयानंद का मूल आग्रह “वेदों की ओर लौटो” मात्र अतीत-गौरव का स्मरण नहीं था, बल्कि वह मानव-चेतना को उसके मौलिक स्रोत से जोड़ने का प्रयास था। उनके अनुसार वेद ज्ञान के शाश्वत सूत्र हैं, जो व्यक्ति को आत्मानुशासन, नैतिकता और सार्वभौमिक मानव-मूल्यों की शिक्षा देते हैं। यह दर्शन मनुष्य को कर्मप्रधान, सत्यनिष्ठ और स्वतंत्र चिंतनशील बनाता है।
उनका जीवन सामाजिक क्रांति का जीवंत दर्शन था। नारी शिक्षा, विधवा पुनर्विवाह, जाति-आधारित भेदभाव का विरोध और समानता का आग्रह—ये सभी उनके आध्यात्मिक दृष्टिकोण की व्यावहारिक अभिव्यक्तियाँ थीं। उन्होंने यह प्रतिपादित किया कि सच्चा धर्म वही है जो मानव को मानव से जोड़ता है, न कि विभाजित करता है।
स्वामी दयानंद का राष्ट्रबोध आध्यात्मिक आधार पर खड़ा था। उनके लिए राष्ट्र केवल भू-खंड नहीं, बल्कि सांस्कृतिक चेतना और नैतिक उत्तरदायित्व का समुच्चय था। आत्मोत्थान के बिना राष्ट्रोत्थान की कल्पना वे अधूरी मानते थे। इसी दृष्टि से उनका चिंतन आज भी प्रासंगिक और मार्गदर्शक है।
उनका तेजस्वी व्यक्तित्व हमें यह स्मरण कराता है कि दर्शन का उद्देश्य पलायन नहीं, बल्कि जागरण है—आत्मा का भी और समाज का भी। महर्षि स्वामी दयानंद सरस्वती की जयंती पर उन्हें नमन करते हुए यही संकल्प सार्थक होगा कि हम सत्य, विवेक और मानव-कल्याण को अपने जीवन का आधार बनाएं।
प्राइवेट हॉस्पिटल और “इंश्योरेंस-आधारित लूट”
प्राइवेट हॉस्पिटल और “इंश्योरेंस-आधारित लूट”
राजेश अस्थाना अनंत
बीमार शरीर, बीमार व्यवस्था
भारत में बीमारी अब केवल शारीरिक संकट नहीं रही, वह एक आर्थिक आपदा बन चुकी है। और इस आपदा का सबसे बड़ा लाभार्थी बन चुका है — प्राइवेट हॉस्पिटल तंत्र। राज्यसभा में उठी यह बात कि “हॉस्पिटल को जैसे ही पता चलता है कि मरीज के पास इंश्योरेंस है, लूट का मीटर चालू हो जाता है”— कोई भावनात्मक आरोप नहीं, बल्कि लाखों परिवारों का जीता-जागता अनुभव है।
आज इलाज से पहले डॉक्टर नहीं, काउंटर पर बैठा बीमा-अधिकारी सवाल पूछता है —
“इंश्योरेंस है या नहीं?”
यही सवाल तय करता है कि मरीज को इलाज मिलेगा या पैकेज,
दवा मिलेगी या डील,
देखभाल होगी या बिलिंग।
इलाज नहीं, पैकेज बिकता है
जैसे ही मरीज ‘इंश्योर्ड’ घोषित होता है, इलाज एक मेडिकल प्रक्रिया नहीं रह जाता, वह एक कमर्शियल प्रोजेक्ट बन जाता है।
अनावश्यक टेस्ट
महंगी दवाएं
ICU में जरूरत से ज़्यादा दिन
मामूली बीमारी में भी “ऑब्ज़र्वेशन” के नाम पर भर्ती
डिस्चार्ज में जानबूझकर देरी
यह सब इसलिए नहीं कि मरीज की हालत नाज़ुक है, बल्कि इसलिए कि इंश्योरेंस की सीमा अभी बाकी है।
यदि मरीज 5 दिन में ठीक हो सकता है, तो उसे 10–15 दिन अस्पताल में रखा जाता है —
क्योंकि बीमारी नहीं, पॉलिसी की वैधता इलाज तय कर रही होती है।
डॉक्टर से पहले अकाउंटेंट
प्राइवेट हॉस्पिटल में आज डॉक्टर से ज़्यादा अहम भूमिका निभाता है —
अकाउंट्स डिपार्टमेंट।
इलाज का निर्णय मेडिकल साइंस नहीं, बल्कि यह तय करता है कि:
कौन सा टेस्ट इंश्योरेंस में क्लेम हो सकता है
कौन सी दवा बिल में जोड़ी जा सकती है
कौन सा प्रोसीजर “रिकमेंडेड” दिखाया जा सकता है
यहाँ मरीज रोगी नहीं, फाइल नंबर बन जाता है।
आम आदमी: दो तरफ़ से ठगा हुआ
जिसके पास इंश्योरेंस नहीं — वह इलाज से पहले ही हार जाता है।
जिसके पास इंश्योरेंस है — वह इलाज के नाम पर लूटा जाता है।
और अंत में?
क्लेम लिमिट खत्म
अगली बीमारी के लिए पॉलिसी महंगी
प्रीमियम बढ़ा हुआ
मानसिक और आर्थिक थकान अलग
यह कैसी विडंबना है कि बीमा सुरक्षा नहीं, शोषण का लाइसेंस बन चुका है।
सरकारी चुप्पी और नियमन की कमी
सबसे बड़ा सवाल यह नहीं कि प्राइवेट हॉस्पिटल ऐसा क्यों कर रहे हैं,
सबसे बड़ा सवाल है — उन्हें रोक कौन रहा है?
इलाज के रेट तय नहीं
टेस्ट की अनिवार्यता पर निगरानी नहीं
इंश्योरेंस क्लेम और मेडिकल आवश्यकता के बीच कोई स्वतंत्र ऑडिट नहीं
स्वास्थ्य व्यवस्था को बाजार के हवाले कर दिया गया है,
जहाँ मरीज ग्राहक है और बीमारी अवसर।
इलाज व्यापार नहीं, अधिकार है
स्वास्थ्य सेवा कोई लग्ज़री नहीं, मौलिक अधिकार है।
लेकिन जब हॉस्पिटल पाँच सितारा होटल से महंगे हो जाएं,
और बीमारी रूम कैटेगरी से तय हो —
तो समझ लीजिए व्यवस्था बीमार हो चुकी है।
अब क्या ज़रूरी है?
इलाज के मानक प्रोटोकॉल अनिवार्य हों
इंश्योरेंस आधारित इलाज पर स्वतंत्र मेडिकल ऑडिट
ICU, टेस्ट और भर्ती की अवधि पर कानूनी सीमाएं
मरीज को हर प्रक्रिया की लिखित वजह
सरकारी अस्पतालों को मजबूत करना — ताकि विकल्प रहे
निष्कर्ष
आज सवाल यह नहीं कि प्राइवेट हॉस्पिटल गलत कर रहे हैं या नहीं,
सवाल यह है कि हम कब तक इसे सामान्य मानते रहेंगे?
बीमारी शरीर की होती है,
पर लूट व्यवस्था की।
और जब तक इलाज मुनाफ़े का साधन रहेगा,
तब तक अस्पताल कम — कारोबारी केंद्र ज़्यादा रहेंगे।
सरकार को सोचना ही नहीं, कदम उठाना होगा।
क्योंकि अगला मरीज — कोई और नहीं, हम ही हो सकते हैं।
राजेश अस्थाना अनंत
राजनीति से परे थाली की सुरक्षा: खाद्य-मिलावट के खिलाफ साझा जिम्मेदारी
यह विषय किसी दल, नेता या विचारधारा से बड़ा है—यह सीधे नागरिकों के स्वास्थ्य, भरोसे और जीवन से जुड़ा है। जब कोई सांसद या जनप्रतिनिधि सार्वजनिक हित का मुद्दा उठाता है, तो उसे दलगत चश्मे से नहीं, लोकहित की कसौटी पर परखा जाना चाहिए। राज्यसभा सांसद राघव चड्ढा द्वारा खाद्य-मिलावट पर उठाई गई चिंता इसी श्रेणी में आती है।
आज स्थिति यह है कि बाज़ार में “शुद्धता”, “हाइजीन” और “क्वालिटी” के लेबल लगे उत्पादों के पीछे एक डरावनी सच्चाई छिपी है।
दूध में यूरिया, सब्ज़ियों में ऑक्सीटोसिन, पनीर में कॉस्टिक सोडा, मसालों में ईंट का पाउडर, पोल्ट्री में स्टेरॉयड और आइसक्रीम में डिटर्जेंट जैसी बातें अब अफ़वाह नहीं रहीं—ये जांचों में बार-बार उजागर हो चुकी हकीकतें हैं। विडंबना यह है कि जिन खाद्य वस्तुओं को कुछ देशों में पालतू जानवरों के लिए भी अनुपयुक्त माना जाता है, वही वस्तुएँ यहाँ “स्टैंडर्ड” के नाम पर बेची जा रही हैं।
यह समस्या केवल महानगरों तक सीमित नहीं है। आजमगढ़ जैसे जिलों में भी समय-समय पर खाद्य सुरक्षा विभाग द्वारा छापों में मिलावटी दूध, नकली पनीर, रंग-रसायन मिले मसाले और प्रतिबंधित केमिकल्स पकड़े जाने की खबरें सामने आती रही हैं। ये कार्रवाइयाँ यह बताने के लिए पर्याप्त हैं कि समस्या जमीनी और व्यापक है—और उपभोक्ता कहीं भी सुरक्षित नहीं।
इस मुद्दे पर संतुलन ज़रूरी है।
- एक ओर निगरानी तंत्र की कमजोरी, सीमित संसाधन और ढीला प्रवर्तन है।
- दूसरी ओर लालच, कम लागत में अधिक मुनाफ़ा और उपभोक्ताओं की जानकारी का अभाव।
- साथ ही, ईमानदार उत्पादकों और व्यापारियों को भी उसी तराज़ू में तौला जाता है, जो अन्याय है।
समाधान भी राजनीति से ऊपर उठकर ही निकलेगा:
- कड़े और त्वरित दंड—लाइसेंस रद्दीकरण से लेकर आपराधिक मुक़दमे तक।
- नियमित, पारदर्शी और स्वतंत्र जांच—रैंडम सैंपलिंग, सार्वजनिक रिपोर्टिंग।
- उपभोक्ता जागरूकता—क्या देखें, कैसे पहचानें, कहाँ शिकायत करें।
- ईमानदार कारोबारियों का संरक्षण—ताकि वे प्रतिस्पर्धा में न पिसें।
- तकनीक का उपयोग—ट्रेसबिलिटी, QR-आधारित जांच, मोबाइल लैब्स।
खाद्य-मिलावट पर चुप्पी, असहमति या राजनीतिक शोर—तीनों ही खतरनाक हैं। ज़रूरत है साझा संकल्प की। अगर आज हम राजनीति से ऊपर उठकर समर्थन नहीं करेंगे, तो कल इसकी कीमत अस्पतालों की कतारों और घटती उम्र से चुकानी पड़ेगी।
यह मुद्दा विपक्ष-सत्ता का नहीं, थाली में ज़हर बनाम जीवन का है।