रास बिहारी बोस : स्वतंत्रता संग्राम के अंतरराष्ट्रीय शिल्पकार

रास बिहारी बोस : स्वतंत्रता संग्राम के अंतरराष्ट्रीय शिल्पकार
राजेश अस्थाना अनंत

महान क्रांतिकारी रास बिहारी बोस भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के उन अग्रदूतों में हैं, जिन्होंने संघर्ष को केवल देश की सीमाओं तक नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय धरातल तक पहुँचाया। उनकी पुण्यतिथि पर उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए, स्वतंत्रता आंदोलन में उनकी भूमिका की विस्तृत समीक्षा अत्यंत आवश्यक है।

रास बिहारी बोस (1886–1945) का नाम भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के उस अध्याय से जुड़ा है, जहाँ क्रांति, संगठन, कूटनीति और दूरदर्शिता एक साथ दिखाई देती है। वे केवल एक क्रांतिकारी नहीं थे, बल्कि एक रणनीतिक चिंतक, संगठनकर्ता और विचारधारा के वाहक थे, जिन्होंने भारत की आज़ादी की लड़ाई को एशिया के मंच तक पहुँचाया।

1. प्रारंभिक जीवन और क्रांतिकारी चेतना
रास बिहारी बोस का जन्म बंगाल में हुआ। आरंभ से ही उनमें औपनिवेशिक शासन के प्रति तीव्र असंतोष था। वे अनुशीलन समिति और युगांतर जैसे क्रांतिकारी संगठनों से जुड़े और युवाओं को संगठित करने में सक्रिय रहे। उनका उद्देश्य केवल प्रतिकार नहीं, बल्कि सशस्त्र और संगठित क्रांति के माध्यम से स्वतंत्रता प्राप्त करना था।

2. गदर और दिल्ली षड्यंत्र
1912 में लॉर्ड हार्डिंग पर बम प्रहार (दिल्ली षड्यंत्र) में रास बिहारी बोस की प्रमुख भूमिका रही। यद्यपि यह प्रयास सफल नहीं हुआ, परंतु इस घटना ने ब्रिटिश शासन को यह स्पष्ट संकेत दे दिया कि भारत में क्रांति की आग सुलग चुकी है।
इसके बाद 1915 के गदर आंदोलन में भी उन्होंने केंद्रीय भूमिका निभाई। इस आंदोलन का लक्ष्य था – ब्रिटिश सेना के भारतीय सिपाहियों में विद्रोह कराकर सत्ता पलटना।

3. जापान प्रवास और अंतरराष्ट्रीय रणनीति
ब्रिटिश सरकार की कड़ी निगरानी से बचते हुए रास बिहारी बोस जापान पहुँचे। यहीं से उनके योगदान का एक नया और अत्यंत महत्वपूर्ण अध्याय आरंभ होता है।
जापान में रहते हुए उन्होंने न केवल अपनी पहचान बनाए रखी, बल्कि भारतीय स्वतंत्रता के पक्ष में जापानी समाज, बुद्धिजीवियों और राजनीतिक नेतृत्व को प्रभावित किया। यह उस समय असाधारण कार्य था।

4. आज़ाद हिन्द आंदोलन की आधारशिला
रास बिहारी बोस ही वह सेतु थे, जिन्होंने प्रवासी भारतीयों को संगठित कर आजाद हिन्द फौज की वैचारिक और संगठनात्मक नींव रखी।
उन्होंने इंडियन इंडिपेंडेंस लीग का गठन किया, जिसका उद्देश्य था – विदेशों में बसे भारतीयों को आज़ादी के लिए एकजुट करना।

यही वह मंच था, जिसने आगे चलकर नेताजी सुभाष चंद्र बोस को नेतृत्व प्रदान किया। रास बिहारी बोस ने अत्यंत विनम्रता और दूरदर्शिता के साथ नेतृत्व नेताजी को सौंपा, जो उनके महान व्यक्तित्व का प्रमाण है।

5. नेताजी और रास बिहारी बोस : वैचारिक निरंतरता
रास बिहारी बोस को नेताजी का मार्गदर्शक और प्रेरणास्रोत कहा जाए तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। उन्होंने नेताजी को न केवल संगठन सौंपा, बल्कि एक स्पष्ट लक्ष्य, अंतरराष्ट्रीय समर्थन और सशस्त्र संघर्ष की दिशा भी दी।
आजाद हिन्द फौज का जो स्वरूप हमें दिखाई देता है, उसकी जड़ें रास बिहारी बोस के चिंतन और प्रयासों में निहित हैं।

6. त्याग, तपस्या और विरासत
रास बिहारी बोस का जीवन व्यक्तिगत सुख, परिवार और मातृभूमि से दूर रहकर बीता। वे जीवन भर भारत लौट नहीं सके, परंतु उनका हृदय भारत की आज़ादी के लिए धड़कता रहा।
1945 में जापान में उनका निधन हुआ, परंतु वे स्वतंत्र भारत की नींव रखने वालों में सदा स्मरणीय रहेंगे।

निष्कर्ष
रास बिहारी बोस भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के अल्प-चर्चित किंतु अत्यंत महत्वपूर्ण नायक हैं। उन्होंने यह सिद्ध किया कि स्वतंत्रता की लड़ाई केवल देश के भीतर ही नहीं, बल्कि वैश्विक मंच पर भी लड़ी जा सकती है।
उनका योगदान यह सिखाता है कि क्रांति केवल आवेग नहीं, संगठन, धैर्य और दूरदृष्टि का परिणाम होती है।

उनकी पुण्यतिथि पर हम उन्हें नमन करते हुए यह स्वीकार करते हैं कि
स्वाधीन भारत के स्वर्णिम इतिहास में रास बिहारी बोस का नाम अमिट है।
राजेश अस्थाना अनंत


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