छत्रपति शिवाजी महाराज : संघर्ष, स्वराज और स्वाभिमान का दार्शनिक घोष

छत्रपति शिवाजी महाराज : संघर्ष, स्वराज और स्वाभिमान का दार्शनिक घोष
राजेश अस्थाना अनंत

जब हौसले बुलंद हों, तो पहाड़ भी मिट्टी का ढेर लगते हैं—यह पंक्ति केवल प्रेरक कथन नहीं, बल्कि छत्रपति शिवाजी महाराज के सम्पूर्ण जीवन-दर्शन का सार है। उनका जीवन एक योद्धा की कथा भर नहीं, बल्कि संघर्ष, विवेक, नीति और आत्मसम्मान पर आधारित एक गहन दार्शनिक यात्रा है।

1. संघर्ष से संस्कार तक
शिवाजी महाराज का जन्म एक ऐसे समय में हुआ जब भारत राजनीतिक अस्थिरता, विदेशी आक्रमणों और आंतरिक विघटन से जूझ रहा था। उन्होंने बाल्यावस्था से ही यह समझ लिया था कि स्वतंत्रता केवल तलवार से नहीं, बल्कि चेतना, संगठन और नैतिक बल से प्राप्त होती है। उनकी माता जिजाऊ द्वारा दिए गए संस्कारों ने उन्हें यह सिखाया कि शक्ति का उद्देश्य शोषण नहीं, संरक्षण है।

2. हिन्द स्वराज : सत्ता नहीं, स्वाभिमान
शिवाजी महाराज द्वारा प्रतिपादित हिन्द स्वराज का विचार केवल एक राज्य-व्यवस्था नहीं था, बल्कि आत्मनिर्भरता और सांस्कृतिक स्वाभिमान का घोष था। उनके लिए स्वराज का अर्थ था—ऐसा शासन जहाँ न्याय, धर्म और लोककल्याण सर्वोपरि हों। यह दर्शन आज के लोकतांत्रिक मूल्यों से भी कहीं गहरा और मानवीय दिखाई देता है।

3. युद्धनीति और नैतिकता का संतुलन
शिवाजी महाराज को सर्वश्रेष्ठ रणनीतिकार इसलिए नहीं कहा जाता कि उन्होंने युद्ध जीते, बल्कि इसलिए कि उन्होंने युद्ध को अंतिम विकल्प माना। उनकी गुरिल्ला युद्धनीति परिस्थितियों के अनुकूल बुद्धि के प्रयोग का उदाहरण है। साथ ही, स्त्रियों, साधुओं और सामान्य नागरिकों के प्रति उनका सम्मान यह सिद्ध करता है कि नीति विहीन विजय, पराजय से भी निकृष्ट होती है।

4. धर्मरक्षा का व्यापक अर्थ
शिवाजी महाराज का धर्म केवल पूजा-पद्धति तक सीमित नहीं था। उनके लिए धर्म का अर्थ था—न्याय, करुणा, सत्य और कर्तव्य। वे किसी भी धर्म के विरुद्ध नहीं थे, बल्कि अधर्म और अत्याचार के विरुद्ध थे। यही कारण है कि उनके प्रशासन में विभिन्न समुदायों को सम्मान और सुरक्षा प्राप्त थी।

5. नेतृत्व का दार्शनिक आदर्श
शिवाजी महाराज का नेतृत्व भय पर नहीं, विश्वास पर आधारित था। वे स्वयं कष्ट सहते थे, पर प्रजा पर बोझ नहीं डालते थे। यह नेतृत्व का वह आदर्श है जहाँ राजा सेवक होता है और सत्ता साधन, साध्य नहीं।

6. आज के संदर्भ में शिवाजी दर्शन
आज जब राष्ट्र, समाज और व्यक्ति अनेक स्तरों पर संकट से गुजर रहे हैं, शिवाजी महाराज का जीवन हमें यह सिखाता है कि

स्वतंत्रता का आधार आत्मसम्मान है,

शक्ति का मूल्य नैतिकता से तय होता है,

और संस्कृति जीवित रहती है संघर्ष से, समझौते से नहीं।

निष्कर्ष
छत्रपति शिवाजी महाराज इतिहास के पन्नों में बंद कोई चरित्र नहीं, बल्कि साहस, विवेक और राष्ट्रधर्म की जीवित चेतना हैं। उनका जीवन हमें बताता है कि यदि उद्देश्य पवित्र हो और संकल्प अडिग, तो सीमित संसाधन भी असाधारण परिणाम दे सकते हैं।

जय भवानी।
जय शिवाजी।
राजेश अस्थाना अनंत


स्वामी रामकृष्ण परमहंस : भक्ति, साधना और समन्वय का दार्शनिक प्रकाश

स्वामी रामकृष्ण परमहंस : भक्ति, साधना और समन्वय का दार्शनिक प्रकाश
राजेश अस्थाना अनंत
भारतीय आध्यात्मिक परंपरा में स्वामी रामकृष्ण परमहंस का व्यक्तित्व किसी एक संप्रदाय, दर्शन या पूजा-पद्धति में सीमित नहीं है। वे स्वयं एक जीवंत प्रयोगशाला थे, जहाँ भक्ति, ज्ञान, कर्म और योग—सभी धाराएँ एक साथ प्रवाहित होती हैं। माँ काली के अनन्य उपासक होकर भी वे निराकार ब्रह्म के साक्षात्कारकर्ता थे; इसीलिए उनका जीवन अनुभवजन्य दर्शन (Experiential Philosophy) का सर्वोच्च उदाहरण बनता है।

भक्ति से अद्वैत तक : अनुभव का दर्शन
रामकृष्ण परमहंस के लिए ईश्वर कोई बौद्धिक अवधारणा नहीं, बल्कि प्रत्यक्ष अनुभूति थे। उनकी भक्ति भावुकता नहीं, बल्कि आत्म-विसर्जन थी—जहाँ अहं का पूर्ण क्षय होकर साधक और साध्य का भेद मिट जाता है। उन्होंने वैष्णव भक्ति, शाक्त साधना, अद्वैत वेदान्त, इस्लाम और ईसाई साधना—सबको स्वयं जीकर सिद्ध किया कि सत्य एक है, मार्ग अनेक।
यहाँ दर्शन ग्रंथों से नहीं, साधना के तप से जन्म लेता है। रामकृष्ण का अद्वैत शुष्क तर्क नहीं, बल्कि करुणा से भीगा हुआ अद्वैत है—जहाँ हर जीव में ईश्वर की उपस्थिति देखी जाती है।

मानवता और समरसता की दृष्टि
उनकी साधना का अंतिम निष्कर्ष सामाजिक समरसता में प्रकट होता है। वे जाति, धर्म, भाषा और लिंग के भेदों को आध्यात्मिक अज्ञान का परिणाम मानते थे। उनके लिए मानव-सेवा ही ईश्वर-सेवा थी—पर उपदेश के रूप में नहीं, स्वाभाविक करुणा के रूप में।
यही कारण है कि उनका दर्शन किसी मठ की चारदीवारी में बंद नहीं रहा; वह आगे चलकर समाज-सेवा, शिक्षा और राष्ट्र-निर्माण के रूप में फला-फूला।

गुरु–शिष्य का अद्वितीय संबंध : रामकृष्ण और विवेकानंद
स्वामी विवेकानंद का निर्माण
रामकृष्ण परमहंस और स्वामी विवेकानंद का संबंध केवल गुरु–शिष्य का नहीं, बल्कि चेतना के हस्तांतरण का संबंध है। जहाँ रामकृष्ण स्वयं समाधि में लीन रहने वाले संत थे, वहीं विवेकानंद कर्मभूमि में उतरने वाले सिंह थे।

युवा नरेन्द्र (विवेकानंद) तर्कशील थे, प्रश्नाकुल थे, ईश्वर को प्रमाण के तराजू पर तौलना चाहते थे। रामकृष्ण ने उन्हें दर्शन नहीं समझाया—उन्होंने ईश्वर को दिखाया। यही वह क्षण था जहाँ तर्क अनुभव के आगे नतमस्तक हुआ।

पूरक व्यक्तित्व

रामकृष्ण — अंतर्मुखी, भावसमाधि में स्थित, साधना के शिखर पर

विवेकानंद — बहिर्मुखी, ओजस्वी, कर्म और संगठन के प्रतीक

रामकृष्ण ने विवेकानंद को वह आध्यात्मिक आधार दिया, जिससे वे संसार का सामना कर सकें; और विवेकानंद ने गुरु की अनुभूति को वैश्विक भाषा दी—शिकागो से लेकर भारत के गाँवों तक।

दर्शन का सामाजिक विस्तार
रामकृष्ण का वाक्य— “जीव में शिव की सेवा”—विवेकानंद के हाथों रामकृष्ण मिशन की सेवा-दृष्टि बना। यहाँ साधना पलायन नहीं, बल्कि समाज में उतरकर पीड़ा हरने का संकल्प बनी।

दार्शनिक निष्कर्ष
स्वामी रामकृष्ण परमहंस भारतीय दर्शन की उस धारा के प्रतिनिधि हैं जहाँ अनुभव सर्वोपरि है। उन्होंने सिद्ध किया कि आध्यात्मिकता विभाजन नहीं, समन्वय सिखाती है; और विवेकानंद के माध्यम से यह दर्शन विश्व-मानवता का मार्गदर्शक बना।

रामकृष्ण बीज थे, विवेकानंद वटवृक्ष।
गुरु मौन थे, शिष्य वाणी।
पर दोनों की चेतना एक ही थी—
मानव में नारायण की खोज।

राजेश अस्थाना अनंत


14 फ़रवरी : प्रेम का दिन, स्मृति का दिन, प्रश्नों का दिन

14 फ़रवरी : प्रेम का दिन, स्मृति का दिन, प्रश्नों का दिन
राजेश अस्थाना अनंत 

14 फ़रवरी को दुनिया प्रेम का उत्सव मनाती है—गुलाब, शब्द, वादे और स्पर्श। लेकिन इसी तारीख़ ने भारत को एक ऐसा घाव भी दिया है, जो समय के साथ भरता नहीं, बल्कि चेतना को और गहरा करता जाता है। यह दिन हमें याद दिलाता है कि प्रेम केवल देना और पाना नहीं है; कभी-कभी प्रेम का सबसे कठोर रूप त्याग होता है—वह त्याग जिसमें कोई अपने प्राण देकर भी शिकायत नहीं करता।
दार्शनिक दृष्टि से देखें तो प्रेम और बलिदान विरोधी नहीं, बल्कि एक ही सत्य के दो आयाम हैं। व्यक्तिगत प्रेम “मैं” से शुरू होता है; राष्ट्रप्रेम “हम” पर समाप्त होता है। गुलाब क्षणिक हैं—खिलते हैं, मुरझाते हैं; पर जिनकी शहादत से हमारी नींद सुरक्षित है, उनका स्मरण स्थायी है। उन्हें भूल जाना केवल स्मृति की चूक नहीं, नैतिक पतन है—क्योंकि स्मृति ही वह सेतु है जो हमें कृतज्ञ बनाती है।
“ब्लैक डे” केवल शोक का नाम नहीं, आत्मपरीक्षण का आह्वान है। यह पूछता है—क्या हमारा प्रेम जिम्मेदार है? क्या हमारी आज़ादी सजग है? क्या हमारा उत्सव उन सीमाओं को याद करता है जहाँ कोई आज भी चौकन्ना खड़ा है? दर्शन कहता है कि स्वतंत्रता बिना स्मृति के स्वेच्छाचार बन जाती है, और प्रेम बिना उत्तरदायित्व के आत्ममुग्धता।
शहीदों को नमन करना केवल मोमबत्ती जलाना नहीं; यह संकल्प लेना है कि हम सत्य, संवेदना और नागरिक कर्तव्य को रोज़ जिएँगे। हम घृणा नहीं बोएँगे, पर भूल भी नहीं करेंगे। हम प्रेम करेंगे, पर स्मरण के साथ—क्योंकि सच्चा प्रेम वही है जो बलिदान की कीमत समझता है।
इसलिए 14 फ़रवरी प्रेम का दिन भी है और क्षति का दिन भी। गुलाब हाथों में हों तो सिर झुका रहे; हृदय में प्रेम हो तो स्मृति जागती रहे। यही संतुलन हमें मनुष्य भी रखता है और राष्ट्र भी।
वीरों को नमन। 🙏🖤🇮🇳
राजेश अस्थाना अनंत 

महर्षि स्वामी दयानंद सरस्वती : वैदिक चेतना का पुनर्जागरण

महर्षि स्वामी दयानंद सरस्वती : वैदिक चेतना का पुनर्जागरण

राजेश अस्थाना अनंत 

महर्षि स्वामी दयानंद सरस्वती भारतीय चिंतन-परंपरा के उन विरल महापुरुषों में हैं, जिनके लिए दर्शन केवल विचार नहीं, बल्कि जीवन-पद्धति था। वे वैदिक चेतना के महान उद्घोषक थे, जिन्होंने जड़ परंपराओं, अंधविश्वासों और सामाजिक जड़ता के विरुद्ध सत्य, तर्क और आत्मबोध का निर्भीक शंखनाद किया। उनका दर्शन मनुष्य को बाह्य आडंबर से मुक्त कर अंतःकरण की शुद्धि और विवेक की ओर उन्मुख करता है।

स्वामी दयानंद का मूल आग्रह “वेदों की ओर लौटो” मात्र अतीत-गौरव का स्मरण नहीं था, बल्कि वह मानव-चेतना को उसके मौलिक स्रोत से जोड़ने का प्रयास था। उनके अनुसार वेद ज्ञान के शाश्वत सूत्र हैं, जो व्यक्ति को आत्मानुशासन, नैतिकता और सार्वभौमिक मानव-मूल्यों की शिक्षा देते हैं। यह दर्शन मनुष्य को कर्मप्रधान, सत्यनिष्ठ और स्वतंत्र चिंतनशील बनाता है।

उनका जीवन सामाजिक क्रांति का जीवंत दर्शन था। नारी शिक्षा, विधवा पुनर्विवाह, जाति-आधारित भेदभाव का विरोध और समानता का आग्रह—ये सभी उनके आध्यात्मिक दृष्टिकोण की व्यावहारिक अभिव्यक्तियाँ थीं। उन्होंने यह प्रतिपादित किया कि सच्चा धर्म वही है जो मानव को मानव से जोड़ता है, न कि विभाजित करता है।

स्वामी दयानंद का राष्ट्रबोध आध्यात्मिक आधार पर खड़ा था। उनके लिए राष्ट्र केवल भू-खंड नहीं, बल्कि सांस्कृतिक चेतना और नैतिक उत्तरदायित्व का समुच्चय था। आत्मोत्थान के बिना राष्ट्रोत्थान की कल्पना वे अधूरी मानते थे। इसी दृष्टि से उनका चिंतन आज भी प्रासंगिक और मार्गदर्शक है।

उनका तेजस्वी व्यक्तित्व हमें यह स्मरण कराता है कि दर्शन का उद्देश्य पलायन नहीं, बल्कि जागरण है—आत्मा का भी और समाज का भी। महर्षि स्वामी दयानंद सरस्वती की जयंती पर उन्हें नमन करते हुए यही संकल्प सार्थक होगा कि हम सत्य, विवेक और मानव-कल्याण को अपने जीवन का आधार बनाएं।

प्राइवेट हॉस्पिटल और “इंश्योरेंस-आधारित लूट”

प्राइवेट हॉस्पिटल और “इंश्योरेंस-आधारित लूट”
राजेश अस्थाना अनंत

बीमार शरीर, बीमार व्यवस्था
भारत में बीमारी अब केवल शारीरिक संकट नहीं रही, वह एक आर्थिक आपदा बन चुकी है। और इस आपदा का सबसे बड़ा लाभार्थी बन चुका है — प्राइवेट हॉस्पिटल तंत्र। राज्यसभा में उठी यह बात कि “हॉस्पिटल को जैसे ही पता चलता है कि मरीज के पास इंश्योरेंस है, लूट का मीटर चालू हो जाता है”— कोई भावनात्मक आरोप नहीं, बल्कि लाखों परिवारों का जीता-जागता अनुभव है।

आज इलाज से पहले डॉक्टर नहीं, काउंटर पर बैठा बीमा-अधिकारी सवाल पूछता है —

“इंश्योरेंस है या नहीं?”

यही सवाल तय करता है कि मरीज को इलाज मिलेगा या पैकेज,
दवा मिलेगी या डील,
देखभाल होगी या बिलिंग।

इलाज नहीं, पैकेज बिकता है
जैसे ही मरीज ‘इंश्योर्ड’ घोषित होता है, इलाज एक मेडिकल प्रक्रिया नहीं रह जाता, वह एक कमर्शियल प्रोजेक्ट बन जाता है।

अनावश्यक टेस्ट

महंगी दवाएं

ICU में जरूरत से ज़्यादा दिन

मामूली बीमारी में भी “ऑब्ज़र्वेशन” के नाम पर भर्ती

डिस्चार्ज में जानबूझकर देरी

यह सब इसलिए नहीं कि मरीज की हालत नाज़ुक है, बल्कि इसलिए कि इंश्योरेंस की सीमा अभी बाकी है।

यदि मरीज 5 दिन में ठीक हो सकता है, तो उसे 10–15 दिन अस्पताल में रखा जाता है —
क्योंकि बीमारी नहीं, पॉलिसी की वैधता इलाज तय कर रही होती है।

डॉक्टर से पहले अकाउंटेंट
प्राइवेट हॉस्पिटल में आज डॉक्टर से ज़्यादा अहम भूमिका निभाता है —
अकाउंट्स डिपार्टमेंट।

इलाज का निर्णय मेडिकल साइंस नहीं, बल्कि यह तय करता है कि:

कौन सा टेस्ट इंश्योरेंस में क्लेम हो सकता है

कौन सी दवा बिल में जोड़ी जा सकती है

कौन सा प्रोसीजर “रिकमेंडेड” दिखाया जा सकता है

यहाँ मरीज रोगी नहीं, फाइल नंबर बन जाता है।

आम आदमी: दो तरफ़ से ठगा हुआ
जिसके पास इंश्योरेंस नहीं — वह इलाज से पहले ही हार जाता है।
जिसके पास इंश्योरेंस है — वह इलाज के नाम पर लूटा जाता है।

और अंत में?

क्लेम लिमिट खत्म

अगली बीमारी के लिए पॉलिसी महंगी

प्रीमियम बढ़ा हुआ

मानसिक और आर्थिक थकान अलग

यह कैसी विडंबना है कि बीमा सुरक्षा नहीं, शोषण का लाइसेंस बन चुका है।

सरकारी चुप्पी और नियमन की कमी
सबसे बड़ा सवाल यह नहीं कि प्राइवेट हॉस्पिटल ऐसा क्यों कर रहे हैं,
सबसे बड़ा सवाल है — उन्हें रोक कौन रहा है?

इलाज के रेट तय नहीं

टेस्ट की अनिवार्यता पर निगरानी नहीं

इंश्योरेंस क्लेम और मेडिकल आवश्यकता के बीच कोई स्वतंत्र ऑडिट नहीं

स्वास्थ्य व्यवस्था को बाजार के हवाले कर दिया गया है,
जहाँ मरीज ग्राहक है और बीमारी अवसर।

इलाज व्यापार नहीं, अधिकार है
स्वास्थ्य सेवा कोई लग्ज़री नहीं, मौलिक अधिकार है।
लेकिन जब हॉस्पिटल पाँच सितारा होटल से महंगे हो जाएं,
और बीमारी रूम कैटेगरी से तय हो —
तो समझ लीजिए व्यवस्था बीमार हो चुकी है।

अब क्या ज़रूरी है?

इलाज के मानक प्रोटोकॉल अनिवार्य हों

इंश्योरेंस आधारित इलाज पर स्वतंत्र मेडिकल ऑडिट

ICU, टेस्ट और भर्ती की अवधि पर कानूनी सीमाएं

मरीज को हर प्रक्रिया की लिखित वजह

सरकारी अस्पतालों को मजबूत करना — ताकि विकल्प रहे

निष्कर्ष
आज सवाल यह नहीं कि प्राइवेट हॉस्पिटल गलत कर रहे हैं या नहीं,
सवाल यह है कि हम कब तक इसे सामान्य मानते रहेंगे?

बीमारी शरीर की होती है,
पर लूट व्यवस्था की।

और जब तक इलाज मुनाफ़े का साधन रहेगा,
तब तक अस्पताल कम — कारोबारी केंद्र ज़्यादा रहेंगे।

सरकार को सोचना ही नहीं, कदम उठाना होगा।
क्योंकि अगला मरीज — कोई और नहीं, हम ही हो सकते हैं।
राजेश अस्थाना अनंत


राजनीति से परे थाली की सुरक्षा: खाद्य-मिलावट के खिलाफ साझा जिम्मेदारी

यह विषय किसी दल, नेता या विचारधारा से बड़ा है—यह सीधे नागरिकों के स्वास्थ्य, भरोसे और जीवन से जुड़ा है। जब कोई सांसद या जनप्रतिनिधि सार्वजनिक हित का मुद्दा उठाता है, तो उसे दलगत चश्मे से नहीं, लोकहित की कसौटी पर परखा जाना चाहिए। राज्यसभा सांसद राघव चड्ढा द्वारा खाद्य-मिलावट पर उठाई गई चिंता इसी श्रेणी में आती है।

आज स्थिति यह है कि बाज़ार में “शुद्धता”, “हाइजीन” और “क्वालिटी” के लेबल लगे उत्पादों के पीछे एक डरावनी सच्चाई छिपी है।
दूध में यूरिया, सब्ज़ियों में ऑक्सीटोसिन, पनीर में कॉस्टिक सोडा, मसालों में ईंट का पाउडर, पोल्ट्री में स्टेरॉयड और आइसक्रीम में डिटर्जेंट जैसी बातें अब अफ़वाह नहीं रहीं—ये जांचों में बार-बार उजागर हो चुकी हकीकतें हैं। विडंबना यह है कि जिन खाद्य वस्तुओं को कुछ देशों में पालतू जानवरों के लिए भी अनुपयुक्त माना जाता है, वही वस्तुएँ यहाँ “स्टैंडर्ड” के नाम पर बेची जा रही हैं।

यह समस्या केवल महानगरों तक सीमित नहीं है। आजमगढ़ जैसे जिलों में भी समय-समय पर खाद्य सुरक्षा विभाग द्वारा छापों में मिलावटी दूध, नकली पनीर, रंग-रसायन मिले मसाले और प्रतिबंधित केमिकल्स पकड़े जाने की खबरें सामने आती रही हैं। ये कार्रवाइयाँ यह बताने के लिए पर्याप्त हैं कि समस्या जमीनी और व्यापक है—और उपभोक्ता कहीं भी सुरक्षित नहीं।

इस मुद्दे पर संतुलन ज़रूरी है।

  • एक ओर निगरानी तंत्र की कमजोरी, सीमित संसाधन और ढीला प्रवर्तन है।
  • दूसरी ओर लालच, कम लागत में अधिक मुनाफ़ा और उपभोक्ताओं की जानकारी का अभाव।
  • साथ ही, ईमानदार उत्पादकों और व्यापारियों को भी उसी तराज़ू में तौला जाता है, जो अन्याय है।

समाधान भी राजनीति से ऊपर उठकर ही निकलेगा:

  1. कड़े और त्वरित दंड—लाइसेंस रद्दीकरण से लेकर आपराधिक मुक़दमे तक।
  2. नियमित, पारदर्शी और स्वतंत्र जांच—रैंडम सैंपलिंग, सार्वजनिक रिपोर्टिंग।
  3. उपभोक्ता जागरूकता—क्या देखें, कैसे पहचानें, कहाँ शिकायत करें।
  4. ईमानदार कारोबारियों का संरक्षण—ताकि वे प्रतिस्पर्धा में न पिसें।
  5. तकनीक का उपयोग—ट्रेसबिलिटी, QR-आधारित जांच, मोबाइल लैब्स।

खाद्य-मिलावट पर चुप्पी, असहमति या राजनीतिक शोर—तीनों ही खतरनाक हैं। ज़रूरत है साझा संकल्प की। अगर आज हम राजनीति से ऊपर उठकर समर्थन नहीं करेंगे, तो कल इसकी कीमत अस्पतालों की कतारों और घटती उम्र से चुकानी पड़ेगी।
यह मुद्दा विपक्ष-सत्ता का नहीं, थाली में ज़हर बनाम जीवन का है।

गणतंत्र दिवस 26 जनवरी 2026

🇮🇳 गणतंत्र दिवस 26 जनवरी 2026 : हार्दिक शुभकामनाएँ 🇮🇳
राजेश अस्थाना अनंत

26 जनवरी भारतीय लोकतंत्र की आत्मा का उत्सव है—वह दिन जब भारत ने स्वयं को सम्प्रभु, समाजवादी, पंथनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक गणराज्य घोषित कर संविधान को अपने जीवन-मूल्य का आधार बनाया। यह केवल एक तिथि नहीं, बल्कि संघर्ष, संकल्प और समानता की जीवंत परंपरा है।

भारतीय गणतंत्र की प्रमुख उपलब्धियाँ
पिछले दशकों में भारतीय गणतंत्र ने अनेक ऐतिहासिक उपलब्धियाँ अर्जित की हैं।
हमने विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र बनकर यह सिद्ध किया कि विविध भाषाएँ, धर्म, संस्कृतियाँ और विचार एक साझा संवैधानिक ढाँचे में समरस हो सकते हैं।
संविधान ने हर नागरिक को समान अधिकार, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सामाजिक न्याय का भरोसा दिया।

आर्थिक क्षेत्र में भारत ने आत्मनिर्भरता की ओर मजबूत कदम बढ़ाए—डिजिटल इंडिया, स्टार्टअप क्रांति, विज्ञान व अंतरिक्ष में ऐतिहासिक उपलब्धियाँ, और वैश्विक मंच पर भारत की बढ़ती भूमिका इसका प्रमाण हैं।
शिक्षा, स्वास्थ्य, महिला सशक्तिकरण, सामाजिक समावेशन और तकनीकी नवाचार के क्षेत्रों में निरंतर प्रगति ने जन-जीवन को नई दिशा दी है।
लोकतांत्रिक संस्थाओं की मजबूती, शांतिपूर्ण सत्ता हस्तांतरण और जनभागीदारी ने भारतीय गणतंत्र की परिपक्वता को विश्व के सामने स्थापित किया है।

आगामी अपेक्षाएँ और संकल्प
आगामी वर्षों में हम एक ऐसे भारत की अपेक्षा करते हैं जहाँ—
न्याय केवल संवैधानिक शब्द न रहे, बल्कि हर नागरिक के जीवन का अनुभव बने।
शिक्षा और स्वास्थ्य समान रूप से सुलभ हों,
युवा शक्ति को नवाचार और रोजगार के अवसर मिलें,
और विकास के साथ पर्यावरण-संतुलन भी सुरक्षित रहे।

हमें यह संकल्प लेना होगा कि हम संविधान के मूल्यों—न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व—को केवल स्मरण न करें, बल्कि अपने आचरण में उतारें।

आइए, इस गणतंत्र दिवस पर हम सब मिलकर यह प्रण लें कि हम अपने कर्तव्यों के प्रति उतने ही सजग रहेंगे जितने अपने अधिकारों के प्रति—तभी भारतीय गणतंत्र और अधिक सशक्त, समावेशी और उज्ज्वल बनेगा।

आप सभी को 26 जनवरी 2026 के पावन अवसर पर गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ।
जय हिंद! 🇮🇳
राजेश अस्थाना अनंत


नेताजी सुभाष चंद्र बोस : व्यक्तित्व, कृतित्व, संघर्ष और वर्तमान प्रासंगिकता

नेताजी सुभाष चंद्र बोस : व्यक्तित्व, कृतित्व, संघर्ष और वर्तमान प्रासंगिकता
राजेश अस्थाना अनंत

भारत के स्वतंत्रता संग्राम में जिन व्यक्तित्वों ने अपने अदम्य साहस, वैचारिक दृढ़ता और क्रांतिकारी संकल्प से इतिहास की दिशा बदली, उनमें नेताजी सुभाष चंद्र बोस का नाम स्वर्णाक्षरों में अंकित है। 23 जनवरी को मनाई जाने वाली उनकी जयंती केवल एक महान नेता की स्मृति नहीं, बल्कि राष्ट्र के आत्मसम्मान, त्याग और संपूर्ण स्वतंत्रता के स्वप्न का उत्सव है।

1. नेताजी का व्यक्तित्व : विचार, साहस और अनुशासन का संगम
सुभाष चंद्र बोस का व्यक्तित्व बहुआयामी था। वे तेजस्वी बुद्धि, अपार आत्मविश्वास और कठोर अनुशासन के प्रतीक थे। आई.सी.एस. जैसी प्रतिष्ठित सेवा को त्याग देना उनके चरित्र की असाधारण दृढ़ता को दर्शाता है।
उनका व्यक्तित्व केवल एक राजनेता का नहीं, बल्कि एक विचारक, संगठनकर्ता, सैनिक नेता और राष्ट्रभक्त दार्शनिक का था। वे भावुक राष्ट्रवाद के साथ-साथ व्यावहारिक रणनीति के पक्षधर थे।
उनका प्रसिद्ध उद्घोष— “तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आज़ादी दूँगा”—उनके निर्भीक, बलिदानी और कर्मप्रधान व्यक्तित्व का सार प्रस्तुत करता है।

2. नेताजी के कार्य : संगठन, संघर्ष और क्रांति
नेताजी ने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन को नई ऊर्जा और दिशा प्रदान की। उनके प्रमुख कार्यों में—

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में नेतृत्व : वे कांग्रेस के अध्यक्ष बने और पार्टी में अधिक सक्रिय, आक्रामक और निर्णायक भूमिका के समर्थक रहे।

फॉरवर्ड ब्लॉक की स्थापना : वैचारिक मतभेदों के कारण उन्होंने कांग्रेस से अलग होकर फॉरवर्ड ब्लॉक का गठन किया, ताकि स्वतंत्रता आंदोलन को क्रांतिकारी गति मिल सके।

आजाद हिंद फौज का गठन : उनका सबसे ऐतिहासिक योगदान आज़ाद हिंद फौज (INA) का पुनर्गठन और नेतृत्व था।

अंतरराष्ट्रीय समर्थन : उन्होंने जर्मनी, जापान और दक्षिण-पूर्व एशिया में भारत की आज़ादी के लिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग जुटाया।

आजाद हिंद सरकार : 1943 में सिंगापुर में स्वतंत्र भारत की अस्थायी सरकार की स्थापना, जिसमें उन्होंने राष्ट्रीय ध्वज फहराया और शासन की संरचना खड़ी की।


3. भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में भूमिका
जहाँ महात्मा गांधी अहिंसा के मार्ग से स्वतंत्रता के पक्षधर थे, वहीं नेताजी सुभाष चंद्र बोस सशस्त्र संघर्ष को भी आवश्यक मानते थे।
उन्होंने ब्रिटिश साम्राज्यवाद को उसकी सैन्य शक्ति के स्तर पर चुनौती दी। आज़ाद हिंद फौज का नारा— “दिल्ली चलो”—भारतीय जनमानस में स्वाधीनता की तीव्र आकांक्षा का प्रतीक बन गया।
उनके प्रयासों ने ब्रिटिश सरकार की नींव हिला दी। INA के सैनिकों पर चलाए गए मुकदमों ने देशव्यापी जनआंदोलन को जन्म दिया, जिसने अंततः ब्रिटिश सत्ता के अंत को तेज किया।

4. नेताजी की विचारधारा
नेताजी एक ऐसे भारत की कल्पना करते थे—

जो सामाजिक रूप से न्यायपूर्ण हो

आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर हो

राजनीतिक रूप से सशक्त और स्वतंत्र हो

जहाँ धर्म, जाति और भाषा से ऊपर उठकर राष्ट्रीय एकता स्थापित हो

वे अनुशासित लोकतंत्र और समाजवादी झुकाव के समर्थक थे, जिसमें राष्ट्रहित सर्वोपरि हो।

5. वर्तमान समय में नेताजी की प्रासंगिकता
आज के भारत में सुभाष चंद्र बोस की प्रासंगिकता और भी अधिक बढ़ जाती है—

राष्ट्रीय एकता और अखंडता के लिए उनका विचार आज भी प्रेरक है।

युवा शक्ति के लिए उनका साहस, अनुशासन और कर्तव्यनिष्ठा आदर्श है।

आत्मनिर्भर भारत की अवधारणा उनके स्वप्न से गहराई से जुड़ी है।

सिद्धांत और कर्म की एकता—जो आज के सार्वजनिक जीवन में दुर्लभ होती जा रही है—नेताजी के जीवन का मूल मंत्र था।

गोपाल प्रसाद व्यास द्वारा रचित नेताजी सुभाष चंद्र बोस पर आधारित प्रेरक कविता में यह स्पष्ट रूप से उभरता है कि नेताजी केवल एक सेनानायक नहीं, बल्कि जन-जन में आज़ादी की ज्वाला जगाने वाले महापुरुष थे। कविता में उनके ओजस्वी व्यक्तित्व, निर्भीक नेतृत्व और बलिदान की भावना का सजीव चित्रण है। वह युवाओं को संघर्ष, आत्मसम्मान और राष्ट्रहित के लिए उठ खड़े होने का आह्वान करते हैं।

वह ख़ून कहो किस मतलब का
जिसमें उबाल का नाम नहीं
वह ख़ून कहो किस मतलब का
आ सके देश के काम नहीं

वह ख़ून कहो किस मतलब का
जिसमें जीवन न रवानी है
जो परवश में होकर बहता है
वह ख़ून नहीं है पानी है

उस दिन लोगों ने सही सही
खूँ की कीमत पहचानी थी
जिस दिन सुभाष ने बर्मा में
मांगी उनसे कुर्बानी थी

बोले स्वतंत्रता की खातिर
बलिदान तुमहे करना होगा
बहुत जी चुके हो जग में
लेकिन आगे मरना होगा

आजादी के चरणों में जो
जयमाल चढाई जाएगी
वह सुनो तुम्हारे शीशों के
फूलों से गूंथी जाएगी

आज़ादी का संग्राम कहीं
पैसे पर खेला जाता है?
ये शीश कटाने का सौदा
नंगे सर झेला जाता है

आज़ादी का इतिहास कहीं
काली स्याही लिख पाती है?
इसको पाने को वीरों ने
खून की नदी बहाई जाती है

यह कहते कहते वक्ता की
आंखों में खून उतर आया
मुख रक्त वर्ण हो दमक उठा
चमकी उनकी रक्तिम काया

आजानु बाहु ऊंचा करके
वे बोले रक्त मुझे देना
इसके बदले में भारत की
आज़ादी तुम मुझसे लेना

हो गई सभा में उथल पुथल
सीने में दिल न समाते थे
स्वर इंकलाब के नारों के
कोसों तक झाए जाते थे

हम देंगे देंगे ख़ून
स्वर बस यही सुनाई देते थे
रण में जाने को युवक
खड़े तैयार दिखाई देते थे

बोले सुभाष इस तरह नहीं
बातों से मतलब सरता है
मैं कलम बढ़ता हूँ, आये
जो खूनी हस्ताक्षर करता है

इसको भरने वाले जन को
सर्वस्व समर्पण करना है
अपना तन-मन-धन-जन-जीवन
माता को अर्पण करना है

पर यह साधारण पत्र नहीं
आज़ादी का परवाना है
इसपर तुमको अपने तन का
कुछ उज्ज्वल रक्त गिराना है

वह आगे आए जिसकी रग में
खून भारतीय बहता है
वह आगे आए जो ख़ुद को
हिन्दुस्तानी कहता है

वह आगे आए जो इसपर
खूनी हस्ताक्षर देता है
मैं कफन बढाता हूँ आए
जो इसको हँसकर लेता है

सारी जनता हुंकार उठी
हम आते हैं, हम आते हैं
माता के चरणों में लो
हम अपना रक्त चढाते हैं

साहस से बढे युवक उस दिन
देखा बढते ही आते थे
चाकू छुरी कटारियों से
वे अपना रक्त गिराते थे

फिर उसी रक्त की स्याही में
वे अपना कलम डुबोते थे
आज़ादी के परवाने पर
हस्ताक्षर करते जाते थे

उस दिन तारों ने देखा था
हिन्दुस्तानी विश्वास नया
लिखा था जब रणवीरों ने
खूँ से अपना इतिहास नया


उपसंहार
नेताजी सुभाष चंद्र बोस केवल एक ऐतिहासिक व्यक्तित्व नहीं, बल्कि भारत की आत्मा की आवाज़ थे। उनका जीवन हमें सिखाता है कि स्वतंत्रता केवल अधिकार नहीं, बल्कि त्याग, साहस और निरंतर संघर्ष की परिणति होती है।
उनकी जयंती पर उन्हें स्मरण करना तभी सार्थक होगा, जब हम उनके आदर्शों—राष्ट्रभक्ति, अनुशासन, साहस और सामाजिक न्याय—को अपने जीवन और राष्ट्रनिर्माण में उतार सकें।

नेताजी अमर हैं—अपने विचारों में, अपने संघर्ष में और भारत के भविष्य में।
राजेश अस्थाना अनंत


रास बिहारी बोस : स्वतंत्रता संग्राम के अंतरराष्ट्रीय शिल्पकार

रास बिहारी बोस : स्वतंत्रता संग्राम के अंतरराष्ट्रीय शिल्पकार
राजेश अस्थाना अनंत

महान क्रांतिकारी रास बिहारी बोस भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के उन अग्रदूतों में हैं, जिन्होंने संघर्ष को केवल देश की सीमाओं तक नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय धरातल तक पहुँचाया। उनकी पुण्यतिथि पर उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए, स्वतंत्रता आंदोलन में उनकी भूमिका की विस्तृत समीक्षा अत्यंत आवश्यक है।

रास बिहारी बोस (1886–1945) का नाम भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के उस अध्याय से जुड़ा है, जहाँ क्रांति, संगठन, कूटनीति और दूरदर्शिता एक साथ दिखाई देती है। वे केवल एक क्रांतिकारी नहीं थे, बल्कि एक रणनीतिक चिंतक, संगठनकर्ता और विचारधारा के वाहक थे, जिन्होंने भारत की आज़ादी की लड़ाई को एशिया के मंच तक पहुँचाया।

1. प्रारंभिक जीवन और क्रांतिकारी चेतना
रास बिहारी बोस का जन्म बंगाल में हुआ। आरंभ से ही उनमें औपनिवेशिक शासन के प्रति तीव्र असंतोष था। वे अनुशीलन समिति और युगांतर जैसे क्रांतिकारी संगठनों से जुड़े और युवाओं को संगठित करने में सक्रिय रहे। उनका उद्देश्य केवल प्रतिकार नहीं, बल्कि सशस्त्र और संगठित क्रांति के माध्यम से स्वतंत्रता प्राप्त करना था।

2. गदर और दिल्ली षड्यंत्र
1912 में लॉर्ड हार्डिंग पर बम प्रहार (दिल्ली षड्यंत्र) में रास बिहारी बोस की प्रमुख भूमिका रही। यद्यपि यह प्रयास सफल नहीं हुआ, परंतु इस घटना ने ब्रिटिश शासन को यह स्पष्ट संकेत दे दिया कि भारत में क्रांति की आग सुलग चुकी है।
इसके बाद 1915 के गदर आंदोलन में भी उन्होंने केंद्रीय भूमिका निभाई। इस आंदोलन का लक्ष्य था – ब्रिटिश सेना के भारतीय सिपाहियों में विद्रोह कराकर सत्ता पलटना।

3. जापान प्रवास और अंतरराष्ट्रीय रणनीति
ब्रिटिश सरकार की कड़ी निगरानी से बचते हुए रास बिहारी बोस जापान पहुँचे। यहीं से उनके योगदान का एक नया और अत्यंत महत्वपूर्ण अध्याय आरंभ होता है।
जापान में रहते हुए उन्होंने न केवल अपनी पहचान बनाए रखी, बल्कि भारतीय स्वतंत्रता के पक्ष में जापानी समाज, बुद्धिजीवियों और राजनीतिक नेतृत्व को प्रभावित किया। यह उस समय असाधारण कार्य था।

4. आज़ाद हिन्द आंदोलन की आधारशिला
रास बिहारी बोस ही वह सेतु थे, जिन्होंने प्रवासी भारतीयों को संगठित कर आजाद हिन्द फौज की वैचारिक और संगठनात्मक नींव रखी।
उन्होंने इंडियन इंडिपेंडेंस लीग का गठन किया, जिसका उद्देश्य था – विदेशों में बसे भारतीयों को आज़ादी के लिए एकजुट करना।

यही वह मंच था, जिसने आगे चलकर नेताजी सुभाष चंद्र बोस को नेतृत्व प्रदान किया। रास बिहारी बोस ने अत्यंत विनम्रता और दूरदर्शिता के साथ नेतृत्व नेताजी को सौंपा, जो उनके महान व्यक्तित्व का प्रमाण है।

5. नेताजी और रास बिहारी बोस : वैचारिक निरंतरता
रास बिहारी बोस को नेताजी का मार्गदर्शक और प्रेरणास्रोत कहा जाए तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। उन्होंने नेताजी को न केवल संगठन सौंपा, बल्कि एक स्पष्ट लक्ष्य, अंतरराष्ट्रीय समर्थन और सशस्त्र संघर्ष की दिशा भी दी।
आजाद हिन्द फौज का जो स्वरूप हमें दिखाई देता है, उसकी जड़ें रास बिहारी बोस के चिंतन और प्रयासों में निहित हैं।

6. त्याग, तपस्या और विरासत
रास बिहारी बोस का जीवन व्यक्तिगत सुख, परिवार और मातृभूमि से दूर रहकर बीता। वे जीवन भर भारत लौट नहीं सके, परंतु उनका हृदय भारत की आज़ादी के लिए धड़कता रहा।
1945 में जापान में उनका निधन हुआ, परंतु वे स्वतंत्र भारत की नींव रखने वालों में सदा स्मरणीय रहेंगे।

निष्कर्ष
रास बिहारी बोस भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के अल्प-चर्चित किंतु अत्यंत महत्वपूर्ण नायक हैं। उन्होंने यह सिद्ध किया कि स्वतंत्रता की लड़ाई केवल देश के भीतर ही नहीं, बल्कि वैश्विक मंच पर भी लड़ी जा सकती है।
उनका योगदान यह सिखाता है कि क्रांति केवल आवेग नहीं, संगठन, धैर्य और दूरदृष्टि का परिणाम होती है।

उनकी पुण्यतिथि पर हम उन्हें नमन करते हुए यह स्वीकार करते हैं कि
स्वाधीन भारत के स्वर्णिम इतिहास में रास बिहारी बोस का नाम अमिट है।
राजेश अस्थाना अनंत


“जेलेसी वाला नेचर: भगवान की देन या खुद की मेहनत?”





“जेलेसी वाला नेचर: भगवान की देन या खुद की मेहनत?”
राजेश अस्थाना अनंत

कुछ लोग ऐसे होते हैं जिनकी डिग्री जन्म प्रमाण-पत्र के साथ ही छपी होती है—
नाम के आगे नहीं,
सीधे स्वभाव के पीछे लिखा होता है:
“स्पेशलाइज़ेशन: जेलेसी”।

बचपन में अगर किसी बच्चे के हाथ में दो टॉफियाँ हों,
तो ये तीसरे को ढूँढने लगते हैं—
“इसको ज़्यादा क्यों मिली?”
स्कूल में क्लास टॉपर नहीं बने,
तो खुद की मेहनत पर नहीं,
टॉपर की किस्मत पर शक करते हैं।
“ज़रूर टीचर का दूर का रिश्तेदार होगा!”

इनकी जेलेसी बहुआयामी होती है—
पड़ोसी ने नया फ्रिज लिया तो
इनका बीपी बढ़ जाता है।
दोस्त ने वजन कम किया तो
डाइट नहीं,
नज़र लगा देते हैं।
और अगर कोई खुश दिख जाए,
तो ये गंभीर होकर कहते हैं—
“कुछ ना कुछ गड़बड़ ज़रूर है।”

सोशल मीडिया तो इनके लिए
प्रैक्टिकल लैब है।
दूसरे की सफलता देख कर
लाइक नहीं करते,
सीधे आत्मा से सवाल करते हैं—
“इसमें ऐसा क्या खास है?”
पोस्ट पर कमेंट भले न करें,
लेकिन मन में पीएचडी लेवल विश्लेषण
पूरा हो चुका होता है।

सबसे मज़ेदार बात ये कि
ये लोग खुद को
सबसे भोला और सच्चा इंसान समझते हैं।
इनके अनुसार दुनिया के सारे लोग
या तो नकली हैं
या उनसे आगे निकल गए हैं—
और दोनों ही बातें
अक्षम्य अपराध हैं।

कभी-कभी लगता है
ये लोग जेलेसी लेकर पैदा नहीं हुए,
बल्कि कहीं कोई
“ईर्ष्या इंस्टिट्यूट” है,
जहाँ सिखाया जाता है—
“दूसरों की खुशी कैसे सहन न करें”
और पास होने पर
जन्म के साथ ही नियुक्ति मिल जाती है।

ख़ैर, ऐसे लोगों से लड़ने का
एक ही इलाज है—
खुश रहो, आगे बढ़ो,
और मुस्कुरा कर देखो।
क्योंकि आपकी मुस्कान
इनके लिए वही है
जो मिर्च बिना नमक के—
सीधे असर करती है! 😄

राजेश अस्थाना अनंत


चेहरा क्या देखते हो, दिल में उतर के देखो ना।

जीवन को आँकने की भूल और समझ की आवश्यकता
राजेश अस्थाना अनंत

मनुष्य का स्वभाव है—तुलना करना। हम दूसरों को अपने बनाए हुए तराज़ू पर तौलते हैं; किसी को सफल घोषित कर देते हैं, किसी को असफल। पर यह तराज़ू अक्सर हमारा अपना होता है—हमारी सुविधाओं, हमारे संघर्षों, हमारे सपनों और हमारी अपेक्षाओं से गढ़ा हुआ। यही सबसे बड़ी भूल है।

किसी दूसरे व्यक्ति को हम अपने सफलता या असफलता के पैमाने पर नहीं कस सकते, जब तक हम उसके जीवन की दुश्वारियों और उसके जीवन-लक्ष्य को नहीं समझते। क्योंकि हर जीवन की पृष्ठभूमि अलग होती है। कोई समतल रास्ते पर चल रहा होता है, तो कोई पथरीले, काँटों से भरे मार्ग पर। बाहर से जो धीमी चाल दिखती है, वह भीतर चल रही लड़ाई का परिणाम हो सकती है।

समाज प्रायः चेहरे देखकर निर्णय करता है—वेश, पद, धन, प्रतिष्ठा। पर चेहरा तो मुखौटा है, परिस्थितियों द्वारा गढ़ा हुआ। असली मनुष्य उसके भीतर रहता है—उसके डर, उसकी आशाएँ, उसकी हार और उसकी अनकही जीतें। इसलिए कहा गया है—
“चेहरा क्या देखते हो, दिल में उतर के देखो ना।”
यह पंक्ति केवल भावुक आग्रह नहीं, बल्कि एक गहरी दार्शनिक सीख है। यह हमें सहानुभूति (empathy) का मार्ग दिखाती है, जहाँ निर्णय नहीं, समझ प्रधान होती है।

सफलता का अर्थ हर व्यक्ति के लिए एक-सा नहीं होता। किसी के लिए ऊँचा पद सफलता है, तो किसी के लिए दो वक्त की रोटी जुटा लेना। किसी के लिए आत्मनिर्भर होना बड़ी उपलब्धि है, तो किसी के लिए परिस्थितियों के बावजूद ईमानदार बने रहना। जब हम किसी को “असफल” कहते हैं, तो दरअसल हम उसके लक्ष्य को अपने लक्ष्य से बदल देते हैं—और यही अन्याय है।

दार्शनिक दृष्टि से देखें तो जीवन एक दौड़ नहीं, बल्कि एक यात्रा है। इस यात्रा में हर यात्री का बोझ अलग है, गति अलग है और मंज़िल भी अलग। जो व्यक्ति अपने बोझ के साथ एक कदम भी आगे बढ़ता है, वह अपने लिए सफल है, चाहे दुनिया उसे कुछ भी कहे।

बिना समझे किया गया मूल्यांकन अहंकार को जन्म देता है और समझ से किया गया दृष्टिकोण करुणा को। करुणा ही वह सेतु है जो मनुष्य को मनुष्य से जोड़ती है। जब हम दूसरों के दिल में उतरने का प्रयास करते हैं, तब हमें अपने निर्णयों की संकीर्णता दिखाई देती है और दृष्टि व्यापक होती है।

अतः आवश्यकता है कि हम दूसरों को आँकने से पहले ठहरें, सुनें और समझें। चेहरों से आगे जाकर जीवन की परतों को पढ़ें। क्योंकि हो सकता है, जिसे हम असफल समझ रहे हों, वह अपने संघर्ष की सबसे कठिन लड़ाई जीत रहा हो—चुपचाप, बिना किसी तालियों के।

यही जीवन का सत्य है—
समझ के बिना कोई भी निर्णय अधूरा है, और करुणा के बिना कोई भी मूल्यांकन अन्यायपूर्ण।
राजेश अस्थाना अनंत


“ईश्वर : विश्वास और अविश्वास के बीच मानव चेतना की दार्शनिक यात्रा”

“ईश्वर : विश्वास और अविश्वास के बीच मानव चेतना की दार्शनिक यात्रा”
राजेश अस्थाना अनंत

ईश्वर के अस्तित्व का प्रश्न मानव चिंतन के सबसे पुराने और गहरे प्रश्नों में से एक है। सामान्यतः इसे दो ही अवस्थाओं में समझा जाता है—या तो व्यक्ति ईश्वर को मानता है, या नहीं मानता। परंतु दर्शन इस द्वैत को केवल विश्वास-अविश्वास तक सीमित नहीं रखता, बल्कि उसे तर्क, अनुभव और जीवन-दृष्टि से जोड़कर देखता है।

भारतीय दर्शन में ईश्वर का प्रश्न बहुआयामी है। वेदांत की अद्वैत परंपरा में शंकराचार्य ब्रह्म को निराकार, निर्विशेष सत्य मानते हैं—यहाँ ईश्वर किसी व्यक्ति विशेष के रूप में नहीं, बल्कि समस्त अस्तित्व की चेतना है। सांख्य दर्शन ईश्वर को स्वीकार नहीं करता, फिर भी प्रकृति और पुरुष के संतुलन से सृष्टि की व्याख्या करता है। योग दर्शन में ईश्वर एक “विशेष पुरुष” है—आदर्श, मार्गदर्शक, पर अनिवार्य सृष्टिकर्ता नहीं। अर्थात भारतीय दर्शन में ईश्वर को मानना या न मानना, दोनों ही मार्ग आत्मबोध की ओर ले जाते हैं।

पाश्चात्य दर्शन में यह प्रश्न अधिक तर्कप्रधान रहा है। प्लेटो और अरस्तू ने ईश्वर को प्रथम कारण या परम शुभ के रूप में देखा। मध्यकाल में एक्विनास ने ईश्वर के अस्तित्व के पक्ष में तर्क दिए, जबकि आधुनिक युग में डेविड ह्यूम और नीत्शे ने इन धारणाओं को चुनौती दी। नीत्शे का “ईश्वर की मृत्यु” का कथन ईश्वर के अंत से अधिक, पारंपरिक नैतिकता के पतन की घोषणा था। यहाँ ईश्वर को मानना या न मानना, व्यक्ति की बौद्धिक स्वतंत्रता का प्रश्न बन जाता है।

चीनी दर्शन इस द्वैत से कुछ अलग खड़ा दिखाई देता है। कन्फ्यूशियस ने ईश्वर से अधिक नैतिक आचरण और सामाजिक संतुलन पर बल दिया। ताओवाद में ‘ताओ’ कोई व्यक्तिगत ईश्वर नहीं, बल्कि प्रकृति का स्वाभाविक नियम है। यहाँ प्रश्न ईश्वर के अस्तित्व का नहीं, बल्कि उसके साथ सामंजस्य का है।

निष्कर्षतः, ईश्वर को मानना या न मानना एक निजी निर्णय हो सकता है, पर दर्शन बताता है कि यह निर्णय अंतिम नहीं, यात्रा का एक चरण है। कहीं ईश्वर चेतना है, कहीं कारण, कहीं नैतिक अनुशासन और कहीं प्रकृति का नियम। इसलिए शायद सत्य यह नहीं कि ईश्वर है या नहीं, बल्कि यह कि मनुष्य उसे किस दृष्टि से देखता है।
राजेश अस्थाना अनंत


भारतेन्दु हरिश्चंद्र : आधुनिक हिन्दी साहित्य के पितामह

भारतेन्दु हरिश्चंद्र : आधुनिक हिन्दी साहित्य के पितामह
(पुण्यतिथि पर विनम्र श्रद्धांजलि)
राजेश अस्थाना अनंत 

आधुनिक हिन्दी साहित्य के इतिहास में भारतेन्दु हरिश्चंद्र (1850–1885) का नाम युग-प्रवर्तक रचनाकार के रूप में स्वर्णाक्षरों में अंकित है। वे केवल कवि या नाटककार ही नहीं थे, बल्कि पत्रकार, समाज-सुधारक, निबंधकार और सांस्कृतिक चेतना के सजग प्रहरी भी थे। उनकी अल्पायु—केवल 35 वर्ष—के बावजूद उनका साहित्यिक अवदान इतना व्यापक और गहन है कि हिन्दी नवजागरण का संपूर्ण परिदृश्य उनके बिना अधूरा प्रतीत होता है।

हिन्दी नवजागरण के अग्रदूत
भारतेन्दु हरिश्चंद्र का रचनाकाल उस समय का प्रतिनिधित्व करता है जब भारत सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक रूप से गहन संक्रमण से गुजर रहा था। औपनिवेशिक शासन, सामाजिक कुरीतियाँ, भाषायी हीनता और राष्ट्रीय अस्मिता का संकट—इन सबके बीच भारतेन्दु ने हिन्दी को जनभाषा के रूप में प्रतिष्ठित करने का संकल्प लिया। उन्होंने साहित्य को केवल सौंदर्य का साधन न मानकर समाज-परिवर्तन का सशक्त माध्यम बनाया।

आस्था और सांस्कृतिक चेतना
भारतेन्दु की रचनाओं में भारतीय आस्था और सांस्कृतिक मूल्यों की सशक्त अभिव्यक्ति मिलती है। वे भारतीय परंपरा, लोकजीवन और धर्म-संस्कृति से गहरे जुड़े हुए थे। किंतु उनकी आस्था अंधविश्वास नहीं, बल्कि विवेकपूर्ण और लोकमंगलकारी थी। वे ऐसी संस्कृति के पक्षधर थे जो समयानुकूल परिवर्तन को स्वीकार करे और मानव-मूल्यों को केंद्र में रखे।

अस्मिता और भाषा का प्रश्न
भारतेन्दु हरिश्चंद्र ने हिन्दी भाषा को आत्मसम्मान और अस्मिता से जोड़ा। उनका प्रसिद्ध कथन—
“निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल”
हिन्दी साहित्य का घोषवाक्य बन गया। वे मानते थे कि किसी भी राष्ट्र की उन्नति उसकी भाषा, साहित्य और सांस्कृतिक चेतना से जुड़ी होती है। उनकी रचनाओं में भाषायी स्वाभिमान के साथ-साथ भारतीय पहचान की स्पष्ट चेतना दिखाई देती है।

राष्ट्रवाद की चेतना
भारतेन्दु का राष्ट्रवाद भावनात्मक होने के साथ-साथ बौद्धिक भी था। उन्होंने औपनिवेशिक शोषण, आर्थिक दुर्दशा और सामाजिक जड़ता पर तीखा प्रहार किया। उनके नाटक ‘अंधेर नगरी’ में सत्ता की अविवेकशीलता और समाज की विसंगतियों का जो व्यंग्यात्मक चित्रण मिलता है, वह आज भी उतना ही प्रासंगिक है। उनका राष्ट्रवाद किसी संकीर्णता का नहीं, बल्कि जागरूक, आत्मनिर्भर और नैतिक समाज के निर्माण का स्वप्न था।

विधाओं में बहुआयामी योगदान
भारतेन्दु हरिश्चंद्र ने कविता, नाटक, निबंध, पत्रकारिता और अनुवाद—सभी क्षेत्रों में उल्लेखनीय कार्य किया। उन्होंने हिन्दी नाटक को आधुनिक स्वरूप प्रदान किया और पत्रकारिता के माध्यम से जनचेतना को नई दिशा दी। उनके द्वारा संपादित पत्र-पत्रिकाएँ हिन्दी समाज में वैचारिक आंदोलन का केंद्र बनीं।

निष्कर्ष
भारतेन्दु हरिश्चंद्र आधुनिक हिन्दी साहित्य के पितामह इसलिए नहीं कहे जाते कि उन्होंने केवल नए रूप गढ़े, बल्कि इसलिए कि उन्होंने साहित्य को भारतेन्दु हरिश्चंद्र : आधुनिक हिन्दी साहित्य के पितामह, राष्ट्र और संस्कृति से जोड़ा। आस्था, अस्मिता और राष्ट्रवाद से समृद्ध उनकी रचनाएँ हिन्दी साहित्य की अमूल्य धरोहर हैं और आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणास्रोत बनी रहेंगी।

उनकी पुण्यतिथि पर यही सच्ची श्रद्धांजलि होगी कि हम उनकी वैचारिक चेतना, भाषायी स्वाभिमान और राष्ट्रोन्मुख दृष्टि को अपने साहित्य और जीवन में आत्मसात करें।
भारतेन्दु हरिश्चंद्र को विनम्र नमन।
राजेश अस्थाना अनंत 

वृत्त में चलती दुनिया और विनय का दर्शन

वृत्त में चलती दुनिया और विनय का दर्शन
राजेश अस्थाना अनंत

दुनिया यदि सीधी रेखा होती, तो आगे-पीछे का भेद स्थायी होता। कोई सदा आगे रहता और कोई हमेशा पीछे। परंतु संसार की संरचना ही वृत्ताकार है—पृथ्वी की तरह, समय की तरह और जीवन की तरह। इस वृत्त में हम सब चल रहे हैं; कोई स्थायी रूप से आगे नहीं, कोई सदा पीछे नहीं। जो आज आगे दिखाई देता है, वही कल पीछे होगा और जो आज पीछे है, वही किसी और क्षण आगे दिखेगा। यह दृष्टि हमें जीवन के सबसे बड़े भ्रम से मुक्त करती है—श्रेष्ठता और हीनता के भ्रम से।

मनुष्य प्रायः तुलना में जीता है। कोई आगे निकल जाए तो दंभ जन्म लेता है और कोई पीछे रह जाए तो ग्लानि। परंतु वृत्त का दर्शन कहता है कि यह दोनों ही भाव असत्य पर आधारित हैं। आगे होना कोई अंतिम उपलब्धि नहीं और पीछे होना कोई स्थायी दोष नहीं। ये तो केवल क्षणिक स्थितियाँ हैं, जो समय के साथ बदलती रहती हैं। जिस क्षण हम इस सत्य को स्वीकार कर लेते हैं, उसी क्षण हमारा मन हल्का हो जाता है।

दार्शनिक दृष्टि से देखें तो यह विचार भारतीय दर्शन के कर्म-सिद्धांत से जुड़ता है। कर्मफल तत्काल नहीं, बल्कि चक्र में मिलता है। जो आज बोया जाता है, वह कल नहीं तो किसी और मोड़ पर फल देता है। इसी तरह यूनानी दर्शन में भी समय को चक्रीय माना गया है और बौद्ध दर्शन में संसार को निरंतर घूमता हुआ चक्र—संसार -चक्र—कहा गया है। इन सभी परंपराओं का संकेत एक ही है: स्थिरता भ्रम है, परिवर्तन सत्य।

जब हम आगे होने के दंभ से मुक्त होते हैं, तो विनम्रता जन्म लेती है। विनम्रता कमजोरी नहीं, बल्कि यथार्थ का बोध है। और जब हम पीछे होने की ग्लानि छोड़ते हैं, तो आत्मविश्वास जागता है। ग्लानि हमें जड़ बना देती है, जबकि स्वीकार हमें गति देता है। वृत्त में चलने वाला व्यक्ति यह जानता है कि हर मोड़ पर नया दृश्य है, नया अवसर है।

इसलिए जीवन का उद्देश्य किसी से आगे निकलना नहीं, बल्कि अपनी गति को समझना है। न तेज़  दया। हर व्यक्ति अपने अनुभव, कर्म और चेतना के अनुसार चल रहा है। तुलना की जगह करुणा और प्रतिस्पर्धा की जगह आत्म-विकास आए, तो समाज भी संतुलित होगा और व्यक्ति भी।

अंततः यह कामना केवल इतनी नहीं कि कैलेंडर की तारीख़ बदले, बल्कि यह है कि हमारी तक़दीर बदले—और तक़दीर तभी बदलती है जब दृष्टि बदलती है। जिस दिन हम रेखीय सोच छोड़कर वृत्तीय सोच अपना लेते हैं, उसी दिन दंभ भी गल जाता है और ग्लानि भी। तब जीवन एक दौड़ नहीं, एक यात्रा बन जाता है—जहाँ हर कदम अर्थपूर्ण है और हर मोड़ सीख देने वाला।
राजेश अस्थाना अनंत