"गुरु कौड़ियों के नहीं, राष्ट्र की सबसे बड़ी पूँजी हैं"

कहते हैं कि आजकल देश में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का स्वर्णकाल चल रहा है। कोई भी किसी के बारे में कुछ भी कह सकता है। ज्ञान हो या न हो, तथ्यों का बोझ हो या न हो, बस आवाज़ ऊँची होनी चाहिए। ऐसे ही एक महान क्षण में किसी विद्वान वक्ता ने शिक्षकों को “कौड़ी का” घोषित कर दिया। देश को एक नई आर्थिक परिभाषा मिल गई।

अब तक हम समझते थे कि शिक्षक राष्ट्र की नींव होते हैं, लेकिन हमें क्या पता था कि नींव भी कौड़ियों में बिकती है!

यह सुनकर विद्यालय की दीवारें भी शायद मुस्करा उठी होंगी। ब्लैकबोर्ड ने सोचा होगा कि जिस हाथ ने डॉक्टर, इंजीनियर, वैज्ञानिक और न्यायाधीश बनाए, उसकी कीमत आखिर तय हो ही गई। सदियों से लोग गुरु को सम्मान देते रहे, लेकिन आधुनिक युग के कुछ तेजस्वी मस्तिष्कों ने एक ही वाक्य में पूरी परंपरा का मूल्यांकन कर दिया।

वैसे यह भी संभव है कि वे सही कह रहे हों। आखिर आजकल मूल्यांकन का पैमाना ज्ञान नहीं, बल्कि टीआरपी है। जो जितना अधिक दिखाई देता है, वह उतना ही बड़ा माना जाता है। इस हिसाब से तो शिक्षक सचमुच पिछड़ गया। वह कैमरे के सामने बहस नहीं करता, वह कक्षा में बच्चों के भविष्य से बहस करता है। वह प्राइम टाइम में नहीं आता, क्योंकि वह उस समय अगले दिन का पाठ तैयार कर रहा होता है।

अजीब बात है कि जो व्यक्ति जीवन में पहली बार “अ” लिखना सिखाता है, वही सबसे सस्ता घोषित कर दिया जाता है। और जो व्यक्ति प्रतिदिन शब्दों का व्यापार करता है, वही मूल्य निर्धारण समिति का अध्यक्ष बन बैठता है।

कल्पना कीजिए, यदि शिक्षकों ने भी एक दिन घोषणा कर दी कि वे केवल उतनी ही जिम्मेदारी निभाएँगे जितना सम्मान उन्हें मिलता है। तब शायद अस्पतालों में डॉक्टर कम पड़ जाएँ, अदालतों में न्यायाधीश कम पड़ जाएँ, प्रयोगशालाओं में वैज्ञानिक कम पड़ जाएँ और समाचार कक्षों में बोलने वाले विशेषज्ञ भी कम पड़ जाएँ। क्योंकि इन सबकी यात्रा किसी न किसी कक्षा से होकर ही गुज़री है।

विडंबना यह है कि शिक्षक की सफलता कभी उसके नाम से नहीं जानी जाती। जब कोई छात्र आईएएस बनता है, तो समाचार में छात्र का नाम आता है। जब कोई वैज्ञानिक पुरस्कार पाता है, तो वैज्ञानिक का नाम आता है। लेकिन उस शिक्षक का नाम कहीं नहीं आता जिसने उसकी पहली जिज्ञासा को पंख दिए थे। शिक्षक राष्ट्रनिर्माण का वह मजदूर है जिसकी बनाई इमारत पर दूसरों के नाम की पट्टिकाएँ लगती हैं।

आज के समय में शिक्षक से अपेक्षा है कि वह पढ़ाए भी, प्रशासनिक काम भी करे, सर्वे भी करे, चुनाव भी कराए, आँकड़े भी भरे, ऑनलाइन पोर्टल भी संभाले और फिर भी मुस्कराकर राष्ट्रनिर्माण करता रहे। लेकिन सम्मान की बात आए तो कुछ लोगों को उसकी कीमत कौड़ियों में दिखाई देती है।

दरअसल समस्या शिक्षक की नहीं, दृष्टि की है। जिस समाज में प्रसिद्धि को प्रतिष्ठा और शोर को ज्ञान समझ लिया जाता है, वहाँ गुरु की तपस्या दिखाई नहीं देती। वहाँ चॉक की धूल कैमरे की चमक के सामने फीकी लगने लगती है।

पर इतिहास का लेखा-जोखा टीवी बहसों से नहीं लिखा जाता। इतिहास यह नहीं पूछता कि किसने कितनी ऊँची आवाज़ में बोला था। इतिहास यह पूछता है कि किसने आने वाली पीढ़ियों को बेहतर बनाया।

इसलिए शिक्षक को कौड़ी का कह देने से शिक्षक छोटा नहीं होता। उससे केवल इतना पता चलता है कि बोलने वाला ज्ञान की कीमत नहीं समझ पाया। हीरे की पहचान जौहरी करता है; पत्थर समझ लेने से हीरा पत्थर नहीं बन जाता।

जिस दिन समाज यह समझ जाएगा कि राष्ट्र संसदों में कम और विद्यालयों में अधिक बनता है, उस दिन शायद उसे यह भी समझ आ जाएगा कि शिक्षक कौड़ियों के नहीं होते। वे तो वह पूँजी होते हैं, जिन पर पूरी सभ्यता ब्याज खाती है।
क्योंकि राष्ट्र की असली संपत्ति सोना, चाँदी या विदेशी मुद्रा नहीं होती—राष्ट्र की असली संपत्ति उसके शिक्षक होते हैं।

राजेश अस्थाना अनंत

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