संस्कारी सर्टिफिकेटधारी
राजेश अस्थाना अनंत
आजकल पढ़ा-लिखा होना एक डिग्री का सवाल रह गया है और सांस्कृतिक होना एक सोशल मीडिया पोस्ट का। फर्क बस इतना है कि डिग्री दीवार पर टंगी रहती है, और संस्कृति प्रोफ़ाइल फोटो में चमकती रहती है—जब तक कि कोई असली मौका सामने न आ जाए।
हमारे समाज में एक नई प्रजाति विकसित हुई है—“संस्कारी सर्टिफिकेटधारी।” ये लोग हर वाक्य की शुरुआत “हमारी संस्कृति में…” से करते हैं और अंत गाली से। ये वही लोग हैं जो सेमिनार में शाल ओढ़कर सभ्यता पर भाषण देते हैं, और पार्किंग में गाड़ी छू जाने पर उसी शाल को कमर में कसकर युद्धभूमि में उतर आते हैं।
इनकी संस्कृति बहुत नाजुक होती है—बस ट्रैफिक में फँसी एक गाड़ी, वेटर की एक छोटी सी गलती, या सोशल मीडिया पर एक असहमति… और भीतर का ‘संस्कारी ज्वालामुखी’ फट पड़ता है। फिर जो भाषा निकलती है, उसे सुनकर शब्दकोश भी शर्मा जाए और व्याकरण आत्महत्या करने का सोचने लगे।
असल में, पढ़ाई ने इन्हें शब्द दिए हैं, पर संस्कार नहीं। इन्होंने किताबों से ज्ञान तो बटोर लिया, पर व्यवहार में उसे उतारना भूल गए। ये वही लोग हैं जो “नमस्ते” को “हेलो” में अपग्रेड कर चुके हैं, लेकिन “कृपया” और “धन्यवाद” को अभी तक डाउनलोड नहीं कर पाए।
मजेदार बात यह है कि ये खुद को हर समय “सभ्य” साबित करने की दौड़ में लगे रहते हैं। मानो संस्कृति कोई गुण नहीं, बल्कि एक प्रतियोगिता हो—जिसमें सबसे ज़्यादा दिखावा करने वाला विजेता हो। पर जैसे ही असली परीक्षा आती है, ये फेल नहीं होते… बल्कि पूरी कॉपी ही फाड़ देते हैं।
सच तो यह है कि संस्कृति कपड़ों, भाषा या डिग्री में नहीं होती—वह आपके धैर्य, आपके व्यवहार और आपके गुस्से के समय में दिखती है। और वहीं सबसे ज़्यादा पोल खुलती है।
इसलिए अगली बार जब कोई बहुत जोर देकर खुद को “संस्कारी” साबित करे, तो बस उसे थोड़ा इंतज़ार कराइए… असली प्रमाणपत्र खुद-ब-खुद बाहर आ जाएगा।
राजेश अस्थाना अनंत
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