विनायक दामोदर सावरकर : राष्ट्र, इतिहास और राजनीति के त्रिकोण में एक दार्शनिक विमर्श
राजेश अस्थाना अनंत
भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन केवल घटनाओं का क्रम नहीं था, वह विचारों, त्याग और आत्मसंघर्ष की एक विराट प्रयोगशाला भी था। इस प्रयोगशाला में कुछ व्यक्तित्व ऐसे थे जो केवल अपने समय के नहीं, बल्कि आने वाली शताब्दियों के प्रश्नों को भी जन्म देते हैं। विनायक दामोदर सावरकर ऐसे ही युगद्रष्टा थे—जिनका जीवन राष्ट्रसेवा, बौद्धिक साहस और असंख्य अमानवीय यातनाओं की तपश्चर्या से निर्मित हुआ।
सावरकर का योगदान केवल क्रांतिकारी गतिविधियों तक सीमित नहीं था। उन्होंने स्वतंत्रता को राजनीतिक सत्ता-हस्तांतरण से आगे बढ़कर राष्ट्रीय चेतना के रूप में देखा। उनके लिए स्वतंत्रता का अर्थ था—मानसिक दासता से मुक्ति, आत्मसम्मान की पुनर्स्थापना और राष्ट्र को एक सांस्कृतिक-ऐतिहासिक इकाई के रूप में समझना। सेल्युलर जेल की कालकोठरी में बिताए गए वर्ष केवल शारीरिक यातना नहीं थे, वे उस विचार की परीक्षा थे कि क्या मनुष्य का संकल्प सत्ता और क्रूरता से बड़ा हो सकता है। सावरकर ने सिद्ध किया कि विचारों को जंजीरों में नहीं बांधा जा सकता।
दार्शनिक दृष्टि से देखें तो सावरकर का राष्ट्रवाद भावुकता नहीं, बल्कि चेतन बोध था। वे इतिहास को स्मृति के रूप में नहीं, उत्तरदायित्व के रूप में देखते थे। उनका आग्रह था कि राष्ट्र अपनी कमजोरियों को स्वीकार करे, अपनी शक्तियों को पहचाने और भविष्य का निर्माण आत्मगौरव के साथ करे। यह दृष्टि उन्हें कई समकालीन धाराओं से अलग करती है—जहाँ स्वतंत्रता को केवल सत्ता-प्राप्ति का साधन माना गया।
परंतु स्वतंत्रता के पश्चात इतिहास ने एक विचित्र मोड़ लिया। जिन व्यक्तित्वों का मूल्यांकन स्वतंत्र भारत में होना चाहिए था, वह राजनीतिक निहितार्थों और वैचारिक ध्रुवीकरण की भेंट चढ़ गया। सावरकर का मूल्यांकन भी उनके समग्र जीवन और चिंतन के बजाय चयनात्मक दृष्टि से किया गया। यहाँ प्रश्न उठता है—क्या इतिहास का काम न्याय करना है या राजनीति के लिए प्रमाण जुटाना? जब इतिहास सत्ता के औज़ार में बदल जाता है, तब युगद्रष्टा व्यक्तित्व ‘विवाद’ में और राष्ट्र ‘विस्मृति’ में चला जाता है।
दार्शनिक स्तर पर यह स्थिति हमें एक गहरे संकट की ओर संकेत करती है—स्मृति बनाम सुविधा का संकट। सावरकर जैसे व्यक्तित्व स्मृति की माँग करते हैं, जबकि राजनीति सुविधा की। परिणामस्वरूप, उनके योगदान को या तो अतिरंजना में बदला गया या उपेक्षा में ढकेल दिया गया। यह न केवल सावरकर के साथ अन्याय है, बल्कि राष्ट्र की आत्मा के साथ भी।
सावरकर की पुण्यतिथि हमें किसी एक मत को स्वीकार या अस्वीकार करने का अवसर नहीं, बल्कि यह प्रश्न पूछने का अवसर देती है कि क्या हम अपने इतिहास को समग्रता में देखने का साहस रखते हैं? क्या हम उन व्यक्तित्वों को स्वीकार कर सकते हैं जो सरल नहीं, जटिल हैं—परंतु ईमानदार हैं? राष्ट्र का निर्माण केवल सर्वसम्मति से नहीं, बल्कि असहमति को समझने की क्षमता से भी होता है।
अंततः, सावरकर एक व्यक्ति नहीं, एक प्रश्न हैं—राष्ट्र से, इतिहास से और हमसे। उन्हें नमन करना केवल पुष्पांजलि अर्पित करना नहीं, बल्कि उस वैचारिक स्वतंत्रता को सम्मान देना है जिसके लिए उन्होंने अपना जीवन अर्पित कर दिया। जब तक हम उन्हें राजनीतिक चश्मे से नहीं, दार्शनिक विवेक से देखेंगे, तब तक न तो सावरकर को समझ पाएँगे, न स्वयं को।
राजेश अस्थाना अनंत
विनायक दामोदर सावरकर : राष्ट्र, इतिहास और राजनीति के त्रिकोण में एक दार्शनिक विमर्श
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