भारतेन्दु हरिश्चंद्र : आधुनिक हिन्दी साहित्य के पितामह
वृत्त में चलती दुनिया और विनय का दर्शन
वृत्त में चलती दुनिया और विनय का दर्शन
राजेश अस्थाना अनंत
दुनिया यदि सीधी रेखा होती, तो आगे-पीछे का भेद स्थायी होता। कोई सदा आगे रहता और कोई हमेशा पीछे। परंतु संसार की संरचना ही वृत्ताकार है—पृथ्वी की तरह, समय की तरह और जीवन की तरह। इस वृत्त में हम सब चल रहे हैं; कोई स्थायी रूप से आगे नहीं, कोई सदा पीछे नहीं। जो आज आगे दिखाई देता है, वही कल पीछे होगा और जो आज पीछे है, वही किसी और क्षण आगे दिखेगा। यह दृष्टि हमें जीवन के सबसे बड़े भ्रम से मुक्त करती है—श्रेष्ठता और हीनता के भ्रम से।
मनुष्य प्रायः तुलना में जीता है। कोई आगे निकल जाए तो दंभ जन्म लेता है और कोई पीछे रह जाए तो ग्लानि। परंतु वृत्त का दर्शन कहता है कि यह दोनों ही भाव असत्य पर आधारित हैं। आगे होना कोई अंतिम उपलब्धि नहीं और पीछे होना कोई स्थायी दोष नहीं। ये तो केवल क्षणिक स्थितियाँ हैं, जो समय के साथ बदलती रहती हैं। जिस क्षण हम इस सत्य को स्वीकार कर लेते हैं, उसी क्षण हमारा मन हल्का हो जाता है।
दार्शनिक दृष्टि से देखें तो यह विचार भारतीय दर्शन के कर्म-सिद्धांत से जुड़ता है। कर्मफल तत्काल नहीं, बल्कि चक्र में मिलता है। जो आज बोया जाता है, वह कल नहीं तो किसी और मोड़ पर फल देता है। इसी तरह यूनानी दर्शन में भी समय को चक्रीय माना गया है और बौद्ध दर्शन में संसार को निरंतर घूमता हुआ चक्र—संसार -चक्र—कहा गया है। इन सभी परंपराओं का संकेत एक ही है: स्थिरता भ्रम है, परिवर्तन सत्य।
जब हम आगे होने के दंभ से मुक्त होते हैं, तो विनम्रता जन्म लेती है। विनम्रता कमजोरी नहीं, बल्कि यथार्थ का बोध है। और जब हम पीछे होने की ग्लानि छोड़ते हैं, तो आत्मविश्वास जागता है। ग्लानि हमें जड़ बना देती है, जबकि स्वीकार हमें गति देता है। वृत्त में चलने वाला व्यक्ति यह जानता है कि हर मोड़ पर नया दृश्य है, नया अवसर है।
इसलिए जीवन का उद्देश्य किसी से आगे निकलना नहीं, बल्कि अपनी गति को समझना है। न तेज़ दया। हर व्यक्ति अपने अनुभव, कर्म और चेतना के अनुसार चल रहा है। तुलना की जगह करुणा और प्रतिस्पर्धा की जगह आत्म-विकास आए, तो समाज भी संतुलित होगा और व्यक्ति भी।
अंततः यह कामना केवल इतनी नहीं कि कैलेंडर की तारीख़ बदले, बल्कि यह है कि हमारी तक़दीर बदले—और तक़दीर तभी बदलती है जब दृष्टि बदलती है। जिस दिन हम रेखीय सोच छोड़कर वृत्तीय सोच अपना लेते हैं, उसी दिन दंभ भी गल जाता है और ग्लानि भी। तब जीवन एक दौड़ नहीं, एक यात्रा बन जाता है—जहाँ हर कदम अर्थपूर्ण है और हर मोड़ सीख देने वाला।
राजेश अस्थाना अनंत
2025 में एक बार फिर सिद्ध हुआ: जो संबंध जितनी तेजी से बनते हैं, उतनी ही तेजी से उनका क्षरण भी होता है
2025 में एक बार फिर सिद्ध हुआ: जो संबंध जितनी तेजी से बनते हैं, उतनी ही तेजी से उनका क्षरण भी होता है
----- राजेश अस्थाना अनंत
2025 के अनुभव ने एक बार फिर उस शाश्वत सत्य को सामने रखा है जिसे दर्शन सदियों से कहता आया है—जो संबंध बहुत तेजी से बनते हैं, वे उतनी ही तेजी से बिखर भी जाते हैं। यह केवल सामाजिक अनुभव नहीं, बल्कि मनुष्य की चेतना, अपेक्षाओं और समय के प्रति उसके अधैर्य का दार्शनिक परिणाम है।
तेज़ी से बनते संबंध प्रायः भावनाओं की तीव्रता पर खड़े होते हैं, न कि समझ की गहराई पर। जहाँ संवाद से पहले आकर्षण, और जानने से पहले अपनापन आ जाता है, वहाँ संबंध एक कल्पना बन जाते हैं—वास्तविकता नहीं। भारतीय दर्शन में इसे आसक्ति कहा गया है, जो विवेक से नहीं, वासना और मोह से जन्म लेती है। गीता का स्पष्ट कथन है कि मोह से भ्रम उत्पन्न होता है, और भ्रम से विवेक नष्ट होता है। जब विवेक नहीं होता, तो संबंध टिक नहीं पाते।
पाश्चात्य अस्तित्ववादी दर्शन भी इस अनुभव की पुष्टि करता है। सार्त्र और कामू के अनुसार आधुनिक मनुष्य संबंधों में भी तात्कालिक संतुष्टि खोजता है। वह संबंध को प्रक्रिया नहीं, परिणाम मानने लगा है। जैसे ही2025 में एक बार फिर सिद्ध हुआ: जो संबंध जितनी तेजी से बनते हैं, उतनी ही तेजी से उनका क्षरण भी होता है उससे अपेक्षित सुख देना बंद करता है, वह उसे बोझ समझने लगता है। इसीलिए तेज़ी से बने संबंधों में धैर्य का अभाव होता है, और धैर्य के बिना कोई भी मानवीय बंधन स्थायी नहीं हो सकता।
2025 ने यह भी दिखाया कि डिजिटल युग ने संबंधों की गति बढ़ा दी है, पर उनकी जड़ें कमजोर कर दी हैं। एक क्लिक में परिचय, एक संदेश में अपनापन और एक गलतफहमी में दूरी—यह क्रम अब सामान्य हो गया है। चीनी दर्शन में कहा गया है कि जो जल बहुत वेग से बहता है, वह भूमि को सींचने के बजाय बहा ले जाता है। संबंध भी वही हैं—वेग जब अधिक हो, तो पोषण नहीं, क्षरण होता है।
स्थायी संबंध समय माँगते हैं—समय समझने का, स्वीकार करने का और बदलने का। वे धीरे-धीरे बनते हैं, जैसे कोई वृक्ष। जो बीज आज बोया जाता है, वह कल फल नहीं देता। 2025 का अनुभव हमें यही सिखाता है कि संबंधों में गति नहीं, गहराई आवश्यक है; तात्कालिकता नहीं, ठहराव चाहिए।
अंततः यह कहना उचित होगा कि तेज़ी स्वयं में दोष नहीं है, दोष है अधैर्य का। जब मनुष्य संबंधों को उपभोग की वस्तु बना लेता है, तब उनका टूटना अनिवार्य हो जाता है। 2025 का सबसे बड़ा दार्शनिक सबक यही है—जो संबंध धीरे बनते हैं, वे ही समय की परीक्षा में टिकते हैं।
राजेश अस्थाना अनंत
एक आम भारतीय की नजर से...
एक आम भारतीय की नज़र से —
राजेश अस्थाना अनंत
मैं कोई राजनीतिक पंडित नहीं हूँ, न ही चुनावी आंकड़ों का जानकार। मैं बस एक आम भारतीय हूँ, जो हर चुनाव में यही उम्मीद करता है कि क्या कभी हमारी राजनीति जाति से ऊपर उठकर काबिलियत और काम की बात करेगी?
इसी उम्मीद के बीच नितिन नबीन का नाम सामने आता है। मेरे लिए यह सिर्फ किसी एक नेता की कहानी नहीं है, बल्कि उस सोच का संकेत है जिसे भाजपा लगातार आगे बढ़ाने की कोशिश कर रही है।
बिहार में रहने वाला हर आम आदमी जानता है कि यहाँ राजनीति लंबे समय से जाति के तराजू पर तौली जाती रही है। किस समुदाय की आबादी कितनी है, कौन-सा समीकरण किसे फायदा देगा—इन्हीं गणनाओं में राजनीतिक रणनीतियाँ बनती रही हैं। लेकिन जब महज 0.6 प्रतिशत आबादी वाले कायस्थ समाज से आने वाले एक युवा नेता नितिन नबीन को भाजपा राष्ट्रीय स्तर पर बड़ी जिम्मेदारी देती है, तो यह सवाल खुद-ब-खुद उठता है—क्या अब राजनीति में योग्यता की कीमत बढ़ रही है?
एक आम नागरिक के तौर पर मुझे लगता है कि भाजपा का यह कदम साफ संदेश देता है—जाति को वोट बाँटने का औज़ार नहीं, समाज को जोड़ने का माध्यम बनना चाहिए। आबादी कम हो लेकिन काबिलियत ज़्यादा हो, तो तराज़ू का पलड़ा योग्यता की ओर झुकना चाहिए।
45 साल की उम्र में नितिन नबीन का पाँच बार विधायक चुना जाना किसी संयोग का नतीजा नहीं है। यह मेहनत, निरंतर जनसंपर्क और ज़मीनी राजनीति का परिणाम है। मेरे जैसे आम आदमी के लिए यह भरोसा जगाने वाली बात है कि शायद अब पहचान जाति से नहीं, काम से तय होगी।
यह नियुक्ति उन राजनीतिक दलों के लिए भी एक आईना है, जो आज भी सिर्फ जातीय गणित में उलझे हुए हैं। अगर वे नहीं बदले, तो समय और जनता दोनों उन्हें पीछे छोड़ देंगे—क्योंकि अब लोग सिर्फ अपनी जाति नहीं, अपने बच्चों का भविष्य देख रहे हैं।
मेरी नज़र में नितिन नबीन सिर्फ एक नाम नहीं हैं। वे उस बदलते राजनीतिक नैरेटिव का प्रतीक हैं, जहाँ वोट बैंक से ज़्यादा विज़न और पहचान से ज़्यादा प्रदर्शन को अहमियत दी जा रही है।
अगर भाजपा इसी सोच के साथ आगे बढ़ती रही, तो शायद आने वाले समय में हम यह कह पाएँगे कि— भारत की राजनीति ने जाति से नहीं, काबिलियत से अपनी पहचान बनाई।
राजेश अस्थाना अनंत
आतंकवाद — जब मनुष्य, मनुष्यता से निर्वासित हो जाता है
डूबना और तैरना – जीवन का सत्य
डूबना और तैरना – जीवन का सत्य
राजेश अस्थाना अनंत
कभी–कभी ज़िंदगी
हमें इतनी गहराइयों में उतार देती है
कि लगता है—
अब लौट पाना शायद सम्भव नहीं।
पर सच यह है कि
डूबना भी एक प्रकार का जन्म है,
जहाँ हम अपनी ही परतों से
दोबारा गुजरते हैं,
अपने ही अँधेरों को छूते हैं,
और पहचानते हैं
कि प्रकाश बाहर नहीं, भीतर है।
हर बार जब हम गिरते हैं,
हमारी चेतना एक सवाल पूछती है—
“क्या यही अंत है?”
और भीतर से एक धीमी-सी आवाज़ उठती है—
“नहीं, यह प्रारंभ है।”
तैर कर ऊपर आना
सिर्फ संघर्ष नहीं होता,
वह हमारी संभावनाओं का प्रमाण होता है।
हर उभार
हमारी अदृश्य शक्ति का संकेत है,
हर सांस
हमारे अस्तित्व का विधान।
ज़िंदगी चाहे जितना भी दबाए,
आदमी का हौसला
अपने ही वजन से हल्का होता है,
इसलिए ऊपर उठता है।
डूबने का डर
हमारे भीतर की सीमाएँ बनाता है,
और ऊपर तैरना
उन सीमाओं का विसर्जन।
जीवन यही है—
गहराइयों की छाती पर
अपनी ही रोशनी खोज लेना,
और हर हार के बाद
इतना भर यक़ीन रख लेना
कि
मैं फिर उठूँगा,
मैं फिर तैर आऊँगा…
राजेश अस्थाना अनंत